भारत की एडीआर व्यवस्था में व्यापक सुधार की जरूरत, न्यायालयों से बाहर विवाद समाधान पर भरोसा बढ़ाना होगा: सीजेआई सूर्यकांत

CJI Surya Kant

नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने देश की वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि भारत को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिस पर नागरिकों और उद्योग जगत का विश्वास हो तथा लोग पारंपरिक अदालतों के बजाय मध्यस्थता और पंचाट जैसे वैकल्पिक माध्यमों से विवादों का समाधान कराने के लिए आगे आएं।

सीजेआई शुक्रवार को नई दिल्ली में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्बिट्रेशन एंड मेडिएशन (आईआईएएम) की स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित एडीआर समिट-2026 के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। दो दिवसीय सम्मेलन का विषय “वैकल्पिक विवाद समाधान की नई परिकल्पना : नवाचार, प्रौद्योगिकी और न्याय का भविष्य” रखा गया है, जिसमें न्यायाधीशों, पंचों, मध्यस्थों, अधिवक्ताओं, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों और नीति-निर्माताओं ने भाग लिया।

मुख्य न्यायाधीश ने आईआईएएम को 25 वर्ष पूरे होने पर बधाई देते हुए कहा कि यह अवसर केवल संस्था की उपलब्धियों का उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि पिछले ढाई दशकों में भारत की विवाद समाधान प्रणाली की प्रगति का गंभीर मूल्यांकन करने का भी है।

उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में पंचाट और मध्यस्थता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण विधायी और न्यायिक सुधार हुए हैं। सर्वोच्च न्यायालय के संविधान पीठ के कई महत्वपूर्ण निर्णय, पंचाट एवं सुलह अधिनियम में किए गए संशोधन तथा मध्यस्थता अधिनियम, 2023 के लागू होने से इस क्षेत्र को नई दिशा मिली है। साथ ही, ऑनलाइन विवाद समाधान मंचों के विकास ने बिना अदालत पहुंचे विवादों के निपटारे का मार्ग भी प्रशस्त किया है।

हालांकि, सीजेआई ने स्पष्ट किया कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। यदि नागरिकों और व्यावसायिक संस्थाओं का इन व्यवस्थाओं पर विश्वास नहीं होगा, तो पूरा कानूनी ढांचा अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकेगा। उन्होंने कहा कि वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली की वास्तविक सफलता जनता के भरोसे पर निर्भर करती है।

न्यायालयों में लंबित मामलों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देश की अदालतों में इस समय पांच करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें लगभग आधे मामले जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में विचाराधीन हैं। उन्होंने बताया कि लंबित मामलों में लगभग आधे मामलों में सरकार स्वयं पक्षकार है, जबकि करीब 20 प्रतिशत मामले भूमि विवादों से जुड़े हैं, जो कई वर्षों तक चलते रहते हैं और कई बार मूल पक्षकारों के जीवनकाल से भी आगे बढ़ जाते हैं।

सीजेआई ने कहा कि कोई भी न्यायिक व्यवस्था, चाहे उसमें कितने ही संसाधन क्यों न लगाए जाएं, अकेले इतने बड़े लंबित मामलों के बोझ को समाप्त नहीं कर सकती। इसलिए बड़ी संख्या में विवादों का समाधान न्यायालयों के बाहर प्रभावी वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली के माध्यम से किया जाना आवश्यक है।

पंचाट व्यवस्था में सुधार का उल्लेख करते हुए उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णयों, विशेषकर कॉक्स एंड किंग्स लिमिटेड बनाम एसएपी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड तथा पंचाट समझौतों पर स्टाम्प शुल्क से संबंधित फैसलों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन निर्णयों ने पंचाट कानून के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को स्पष्ट किया है और न्यायिक दृष्टिकोण को अधिक सुदृढ़ बनाया है।

इसके साथ ही उन्होंने यह चिंता भी व्यक्त की कि पंचाट एवं सुलह (संशोधन) अधिनियम, 2019 के तहत गठित किए जाने वाले भारतीय पंचाट परिषद का गठन आज तक नहीं हो सका है। यह परिषद पंचाट संस्थानों की ग्रेडिंग और पंचों के प्रत्यायन के लिए बनाई गई थी, लेकिन छह वर्ष बीत जाने के बावजूद इसे कार्यात्मक नहीं बनाया गया है।

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि पूर्व विधि सचिव टी.के. विश्वनाथन की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर तैयार पंचाट एवं सुलह (संशोधन) विधेयक का मसौदा अक्टूबर 2024 में सार्वजनिक किया गया था, लेकिन अब तक उसे संसद में प्रस्तुत नहीं किया गया है।

विदेशी पंचाट संस्थानों पर भारत की निर्भरता को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए सीजेआई ने कहा कि वर्ष 2024 और 2025 में भारतीय पक्षकार सिंगापुर इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर (एसआईएसी) के तीसरे सबसे बड़े विदेशी उपयोगकर्ता रहे। उन्होंने कहा कि भारत अब भी बड़ी संख्या में अपने व्यावसायिक विवाद विदेशी पंचाट केंद्रों में भेज रहा है। यदि मुंबई, दिल्ली जैसे भारतीय पंचाट केंद्रों को मजबूत और विश्वसनीय बनाया जाए, तो देश के व्यवसायी घरेलू संस्थानों को प्राथमिकता देंगे।

मध्यस्थता पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि मध्यस्थता अधिनियम, 2023 ने पहली बार भारत में मध्यस्थता के लिए व्यापक वैधानिक ढांचा उपलब्ध कराया है। इससे मुकदमा दायर करने से पहले मध्यस्थता के माध्यम से विवाद सुलझाने की संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि विशेष रूप से पारिवारिक व्यवसायों से जुड़े विवादों में मध्यस्थता न केवल व्यापार बल्कि पारिवारिक संबंधों को भी सुरक्षित रखने में सफल रहती है।

मध्यस्थता को और प्रभावी बनाने के लिए उन्होंने प्रशिक्षित एवं प्रमाणित मध्यस्थों की संख्या बढ़ाने, व्यावसायिक अनुबंधों में मध्यस्थता संबंधी प्रावधानों को शामिल करने तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समझौतों के प्रवर्तन को आसान बनाने के लिए सिंगापुर कन्वेंशन ऑन मेडिएशन का अनुमोदन करने की आवश्यकता पर बल दिया।

प्रौद्योगिकी की भूमिका पर बोलते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि डिजिटल विवाद समाधान मंच और कृत्रिम बुद्धिमत्ता न्याय वितरण प्रणाली को अधिक कुशल बना सकते हैं, लेकिन इनका उपयोग केवल सहायक उपकरण के रूप में होना चाहिए। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय की सुपेस (SUPACE) और सुवास (SUVAS) जैसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि ये तकनीक दस्तावेजों के वर्गीकरण, अनुवाद, साक्ष्यों के प्रबंधन और प्रारंभिक विश्लेषण में उपयोगी हैं।

हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि अधिकारों, दायित्वों और न्यायसंगत संतुलन से जुड़े अंतिम निर्णय केवल मानव न्यायाधीशों और निर्णयकर्ताओं द्वारा ही लिए जाने चाहिए। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग के लिए स्पष्ट कानूनी ढांचे और प्रभावी मानवीय निगरानी की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

अपने संबोधन के अंत में सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि पंचाट, मध्यस्थता और डिजिटल विवाद समाधान का साझा उद्देश्य लोगों को न्यायालयों से बाहर निष्पक्ष, त्वरित और प्रभावी न्याय उपलब्ध कराना है। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था में विश्वास पैदा करने के लिए विधि महाविद्यालयों, उद्योग जगत, सरकारी विभागों, न्यायाधीशों, पंचों और मध्यस्थों को अपनी क्षमता, ईमानदारी और पेशेवर दक्षता के माध्यम से जनता का भरोसा अर्जित करना होगा।

उन्होंने आईआईएएम के 25 वर्षों के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि संस्था ने व्यावसायिक हितों की रक्षा, संबंधों को बनाए रखने और न्यायालयों के बाहर प्रभावी न्याय व्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।