छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 2011 के मौत के मामले में आरोपी बरी, ट्रायल कोर्ट की पूछताछ पर उठाया सवाल

JUSTICE NARENDRA KUMAR VYAS, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने करीब 15 साल पुराने आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए प्रता‍प सिंह को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 165 के तहत ट्रायल कोर्ट को गवाहों से सवाल पूछने की व्यापक शक्ति जरूर है, लेकिन इस शक्ति का इस्तेमाल अभियोजन पक्ष की कमियों को पूरा करने या गवाह से आरोपी के खिलाफ आवश्यक तथ्य कहलवाने के लिए नहीं किया जा सकता।

मामला बिलासपुर जिले के पेंड्रा थाना क्षेत्र से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार 19 नवंबर 2011 की सुबह उमराज गोंड और शिवनाथ के बीच विवाद हुआ था। आरोप था कि शिवनाथ और उसके बेटे प्रताप सिंह ने लाठी-बांस के डंडे से उमराज गोंड के साथ मारपीट की, जिससे उसकी मौत हो गई। इस मामले में प्रताप सिंह और उसके पिता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 के तहत मामला दर्ज किया गया था।

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन ने आठ गवाहों को पेश किया। ट्रायल कोर्ट ने हत्या का आरोप सिद्ध नहीं माना, लेकिन प्रताप सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 भाग-I के तहत दोषी ठहराते हुए पांच साल के सश्रम कारावास और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। वहीं, सह-आरोपी शिवनाथ को बरी कर दिया गया था। इसके बाद प्रताप सिंह ने हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की।

हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से अधिवक्ता सोमना‍थ वर्मा ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ मामला संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। कई गवाह अभियोजन के समर्थन में नहीं आए। कथित हथियार की जब्ती भी विश्वसनीय तरीके से साबित नहीं हुई और मेडिकल साक्ष्य से भी यह स्पष्ट नहीं हुआ कि मृतक को चोट उसी लाठी से लगी थी। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि जिस साक्ष्य के आधार पर प्रताप सिंह को दोषी ठहराया गया, उसी साक्ष्य पर उसके पिता को बरी किया गया।

हाईकोर्ट ने गवाहों के बयानों का विस्तार से परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि मृतक की पत्नी सुरजवती गोंड घटना के समय घर के अंदर थी। उसने लाठी चलने की आवाज सुनी और उसके बाद बाहर आई। कोर्ट के अनुसार उसके प्रारंभिक बयान से यह स्पष्ट रूप से साबित नहीं होता था कि प्रताप सिंह ने मृतक पर हमला किया था।

फैसले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल ट्रायल कोर्ट द्वारा भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 165 के तहत पूछे गए सवालों को लेकर सामने आया। हाईकोर्ट ने कहा कि इस धारा के तहत न्यायाधीश को सत्य सामने लाने के लिए सवाल पूछने की व्यापक शक्ति प्राप्त है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि न्यायाधीश अभियोजन पक्ष की भूमिका निभाने लगे।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “धारा 165 के तहत न्यायालय की शक्ति का इस्तेमाल अभियोजन पक्ष के मामले की कमी को पूरा करने के लिए नहीं किया जा सकता।” कोर्ट के अनुसार ट्रायल जज द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराना उचित नहीं था, क्योंकि अभियोजन के अन्य साक्ष्यों से उस तथ्य की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती थी।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Ram Chander v. State of Haryana मामले का भी उल्लेख किया। इसमें कहा गया है कि न्यायाधीश का उद्देश्य सत्य की खोज करना है, लेकिन उसे अभियोजन या बचाव पक्ष की भूमिका नहीं अपनानी चाहिए। न्यायालय ने इस सिद्धांत को वर्तमान मामले पर लागू करते हुए कहा कि गवाह को डराने, भ्रमित करने या किसी विशेष उत्तर की ओर ले जाने वाली पूछताछ निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत के अनुरूप नहीं होगी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायिक हस्तक्षेप का उद्देश्य अभियोजन के कमजोर हिस्सों को मजबूत करना नहीं हो सकता। फैसले में कहा गया कि यदि अभियोजन किसी आवश्यक तथ्य को अपने साक्ष्य से साबित नहीं कर पाता, तो न्यायाधीश की पूछताछ के माध्यम से उस कमी को पूरा नहीं किया जा सकता। ऐसा करना निष्पक्ष सुनवाई को प्रभावित कर सकता है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

हाईकोर्ट ने सह-आरोपी को बरी किए जाने के पहलू पर भी विचार किया। सुप्रीम कोर्ट के Javed Shaukat Ali Qureshi v. State of Gujarat के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि समान या लगभग समान साक्ष्य और भूमिका होने की स्थिति में एक आरोपी को दोषी और दूसरे को बरी करने के लिए स्पष्ट आधार होना आवश्यक है। इसे आपराधिक न्याय में “पैरिटी के सिद्धांत” के रूप में देखा जाता है।

इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष प्रताप सिंह के खिलाफ आरोप को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। कोर्ट ने उसे संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। हाईकोर्ट ने 28 सितंबर 2011 को ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया तथा धारा 304 भाग-I IPC के आरोप से प्रताप सिंह को बरी कर दिया।

फैसले में यह भी दर्ज है कि प्रताप सिंह फिलहाल जमानत पर था और उसके जमानत बांड को BNSS की धारा 481 के तहत जारी रखने का निर्देश दिया गया। मामले में हाईकोर्ट ने निचली अदालत के रिकॉर्ड के साथ फैसले की प्रति संबंधित न्यायालय को भेजने का भी निर्देश दिया।

यह फैसला आपराधिक मामलों में न्यायाधीश की भूमिका और निष्पक्ष सुनवाई के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। इसका मूल संदेश यह है कि न्यायालय को सत्य सामने लाने के लिए सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, लेकिन न्यायिक पूछताछ के माध्यम से अभियोजन पक्ष की कमी पूरी करके आरोपी के खिलाफ दोषसिद्धि का आधार तैयार नहीं किया जा सकता।