मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि गर्भावस्था और मातृत्व किसी महिला को शिक्षा के अधिकार से वंचित करने का आधार नहीं बन सकते। अदालत ने एलएलएम की पढ़ाई कर रही एक छात्रा को राहत देते हुए विश्वविद्यालय को उसे अपनी पढ़ाई जारी रखने और परीक्षा में शामिल होने की अनुमति देने का निर्देश दिया।
न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश की एकलपीठ उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें छात्रा ने बताया कि गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी चिकित्सीय जटिलताओं के कारण वह कुछ समय तक नियमित रूप से कक्षाओं में उपस्थित नहीं हो सकी। इसी वजह से उसकी उपस्थिति निर्धारित न्यूनतम सीमा से कम रह गई थी। छात्रा ने मेडिकल दस्तावेज प्रस्तुत कर उपस्थिति में छूट देने का अनुरोध किया था, लेकिन शैक्षणिक अधिकारियों ने उसकी मांग अस्वीकार कर दी।
मामले पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मातृत्व महिलाओं के जीवन का एक स्वाभाविक चरण है और इसे उनकी शैक्षणिक आकांक्षाओं को बाधित करने या समाप्त करने का कारण नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि शैक्षणिक संस्थानों को ऐसे मामलों में मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि महिलाओं को मातृत्व और उच्च शिक्षा के बीच किसी एक को चुनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। संविधान में निहित समानता और गरिमा के सिद्धांतों के अनुरूप शैक्षणिक संस्थानों का दायित्व है कि वे ऐसी वास्तविक परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाएं।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि छात्रा को एलएलएम पाठ्यक्रम जारी रखने की अनुमति दी जाए तथा शैक्षणिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक व्यवस्था की जाए। अदालत ने यह भी कहा कि अन्य औपचारिकताओं के पालन की शर्त पर छात्रा को परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जाए।
