सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के अधिवक्ताओं के सत्यापन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल व्यवस्था विकसित करने और वकीलों के सोशल मीडिया आचरण को विनियमित करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई), सभी राज्य बार काउंसिलों और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को नोटिस जारी किया है। अदालत ने सभी पक्षों से जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई जुलाई में निर्धारित की है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया (बीएआई) की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में “नेशनल डिजिटल रजिस्ट्री फॉर लीगल प्रोफेशन ऑफ इंडिया” (एनडीआरएलपी) स्थापित करने की मांग की गई है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत देश के सभी पंजीकृत अधिवक्ताओं का एक केंद्रीकृत डिजिटल डाटाबेस तैयार किया जाएगा, जिसमें नामांकन की स्थिति, शैक्षणिक योग्यता, अनुशासनात्मक कार्रवाई और अन्य आवश्यक विवरण उपलब्ध रहेंगे। प्रत्येक अधिवक्ता को एक विशिष्ट राष्ट्रीय पहचान संख्या देने तथा क्यूआर कोड आधारित प्रोफाइल की व्यवस्था करने का भी सुझाव दिया गया है, जिससे अदालतें, वादकारी और सरकारी संस्थाएं उनके प्रमाणपत्रों का तत्काल सत्यापन कर सकें।
याचिका में बीसीआई को अधिवक्ताओं के लिए सोशल मीडिया और डिजिटल आचरण संबंधी बाध्यकारी नियम बनाने का निर्देश देने की भी मांग की गई है। इसमें ऑनलाइन प्रचार, भ्रामक प्रस्तुतिकरण और पेशेवर मर्यादा के उल्लंघन पर स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान शामिल करने का सुझाव दिया गया है। साथ ही, अधिवक्ता के रूप में नामांकन से पहले व्यावसायिक नैतिकता और डिजिटल आचरण पर अनिवार्य ऑनलाइन प्रशिक्षण पाठ्यक्रम शुरू करने की मांग भी की गई है।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह एक तकनीक आधारित और व्यावहारिक प्रस्ताव प्रतीत होता है, लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्य बार काउंसिलों, विधि विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थागत निकायों के सहयोग की आवश्यकता होगी। अदालत ने संकेत दिया कि विधि विश्वविद्यालयों को भी प्रक्रिया में शामिल करना पड़ सकता है ताकि शैक्षणिक प्रमाणपत्रों का सत्यापन सुनिश्चित किया जा सके। हालांकि, पीठ ने माना कि पहले एक कार्यशील ढांचा तैयार किया जाना चाहिए और उसके बाद इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने पर विचार किया जा सकता है।
अदालत ने याचिकाकर्ता को प्रस्तावित व्यवस्था का विस्तृत नीति-पत्र दाखिल करने की अनुमति भी दी। पीठ ने यह भी संकेत दिया कि अधिवक्ताओं के सत्यापन से जुड़े मुद्दों की जांच के लिए पहले गठित समिति की पुनर्समीक्षा या पुनर्गठन की आवश्यकता पड़ सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ सामग्री को लेकर भी चिंता व्यक्त की। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत के संज्ञान में ऐसे मामले आए हैं जिनमें कुछ व्यक्तियों द्वारा की गई टिप्पणियां कानूनी विमर्श से असंबंधित और अनुचित प्रतीत होती हैं। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि अधिकांश अधिवक्ता पेशेवर नैतिकता का पालन करते हैं और कुछ घटनाओं के आधार पर पूरे विधिक समुदाय का आकलन नहीं किया जा सकता।
याचिका में कहा गया है कि देश में लगभग 18 लाख पंजीकृत अधिवक्ता हैं, लेकिन वर्तमान व्यवस्था विभिन्न राज्य बार काउंसिलों में बंटी हुई है और कोई एकीकृत, वास्तविक समय में सत्यापन योग्य प्रणाली उपलब्ध नहीं है। इसी कारण फर्जी नामांकन और पहचान संबंधी अनियमितताओं की संभावना बनी रहती है। याचिकाकर्ता का कहना है कि प्रस्तावित राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री इन कमियों को दूर कर पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करेगी। साथ ही, एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में निगरानी समिति गठित कर इसके क्रियान्वयन की निगरानी करने का भी अनुरोध किया गया है।
