आदिवासी भूमि बिक्री पर बड़ा फैसला: 5 एकड़ जमीन बचना अनिवार्य नहीं, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रद्द किए कलेक्टर और राजस्व मंडल के आदेश

High Court of Chhattisgarh - Bilaspur

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आदिवासी भूमि हस्तांतरण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 165(6) के तहत भूमि विक्रय की अनुमति देने के लिए यह कोई अनिवार्य कानूनी शर्त नहीं है कि विक्रेता आदिवासी भू-स्वामी के पास बिक्री के बाद कम से कम 5 एकड़ सिंचित या 10 एकड़ असिंचित भूमि शेष रहे। न्यायालय ने कहा कि राजस्व अधिकारियों द्वारा इस आधार पर अनुमति अस्वीकार करना कानून की गलत व्याख्या है।

न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने विजय बनाम राज्य शासन एवं अन्य मामले में सुनवाई करते हुए मंगेली कलेक्टर तथा छत्तीसगढ़ राजस्व मंडल, बिलासपुर के आदेशों को निरस्त कर दिया। याचिकाकर्ता विजय, जो अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित हैं, ने अपने ऊपर मौजूद कर्ज चुकाने और पारिवारिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपनी भूमि के एक छोटे हिस्से को बेचने की अनुमति मांगी थी। हालांकि कलेक्टर ने यह कहते हुए अनुमति देने से इनकार कर दिया था कि प्रस्तावित बिक्री के बाद याचिकाकर्ता के पास 5 एकड़ से कम भूमि बचेगी। बाद में राजस्व मंडल ने भी इस निर्णय को बरकरार रखा था।

मामले के रिकॉर्ड से पता चला कि याचिकाकर्ता ने ग्राम रैतरा खुर्द स्थित खसरा नंबर 130 की लगभग 0.031/2 एकड़ भूमि बेचने का प्रस्ताव रखा था। तहसीलदार द्वारा की गई जांच में पाया गया कि प्रस्तावित बिक्री के बाद भी याचिकाकर्ता के पास लगभग 1.246 हेक्टेयर अर्थात लगभग 3.076 एकड़ भूमि शेष रहेगी, जो उसके भरण-पोषण के लिए पर्याप्त है। तहसीलदार ने विस्तृत जांच के बाद बिक्री की अनुमति देने की अनुशंसा भी की थी।

JUSTICE AMITENDRA KISHORE PRASAD, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH
JUSTICE AMITENDRA KISHORE PRASAD, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि भूमि बिक्री की आवश्यकता वास्तविक और bona fide थी क्योंकि उसे ऋण चुकाना था तथा पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करना था। यह भी कहा गया कि धारा 165(6) का उद्देश्य आदिवासियों को शोषण से बचाना है, न कि उन्हें वास्तविक आर्थिक जरूरतों के समय अपनी संपत्ति के उपयोग से वंचित करना। दूसरी ओर राज्य सरकार ने दलील दी कि भूमि हस्तांतरण पर प्रतिबंध आदिवासी समुदाय के हितों की रक्षा के लिए बनाए गए हैं और 5 एकड़ का मानक आदिवासी भूमि के विखंडन को रोकने के लिए अपनाया गया प्रशासनिक पैमाना है।

हाईकोर्ट ने धारा 165(6), 165(6-ए) और 165(7) का विस्तार से परीक्षण किया। न्यायालय ने पाया कि धारा 165(6) केवल आदिवासी भू-स्वामी द्वारा गैर-आदिवासी को भूमि हस्तांतरण के लिए कलेक्टर की पूर्व अनुमति की व्यवस्था करती है। वहीं धारा 165(7) न्यायालयी डिक्री या आदेश के निष्पादन में भूमि की कुर्की और नीलामी से संबंधित है। अदालत ने कहा कि राजस्व अधिकारियों ने धारा 165(7) में वर्णित 5 एकड़ और 10 एकड़ की सीमा को गलत तरीके से धारा 165(6) के मामलों पर लागू कर दिया।

न्यायालय ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “धारा 165(6) का साधारण अध्ययन यह नहीं दर्शाता कि भूमि हस्तांतरण की अनुमति देने से पहले आदिवासी भू-स्वामी के पास न्यूनतम 5 एकड़ सिंचित या 10 एकड़ असिंचित भूमि शेष रहना अनिवार्य है।” अदालत ने यह भी कहा कि “संरक्षणात्मक प्रावधानों की ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती जो किसी आदिवासी भू-स्वामी की वास्तविक आजीविका और घरेलू आवश्यकताओं को पूरी तरह विफल कर दे।”

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय State of Madhya Pradesh v. Dinesh Kumar and Others (2025 SCC OnLine SC 754) का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि कलेक्टर को अनुमति देने या अस्वीकार करने का अधिकार है, लेकिन उसका प्रयोग कानून में निर्धारित मानदंडों और उचित कारणों के आधार पर होना चाहिए। न्यायालय ने पाया कि मामले में धोखाधड़ी, दबाव या शोषण का कोई तत्व नहीं दिखता और प्रस्तावित भूमि का बाजार मूल्य भी महत्वपूर्ण था।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने कलेक्टर, मंगेली के 10 मार्च 2022 के आदेश और राजस्व मंडल, बिलासपुर के 24 मार्च 2023 के आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही मामले को पुनर्विचार के लिए सक्षम प्राधिकारी के पास वापस भेजते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की वास्तविक आवश्यकता, शेष भूमि की उपलब्धता, प्रस्तावित लेनदेन की निष्पक्षता और धारा 165(6) के वास्तविक दायरे को ध्यान में रखकर नया कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए। न्यायालय ने यह प्रक्रिया तीन माह के भीतर पूरी करने का निर्देश भी दिया।