अहमदाबाद स्थित आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को बड़ी राहत देते हुए लीव फेयर कंसेशन (LFC) भुगतान पर TDS नहीं काटने के मामले में लगाए गए टैक्स, ब्याज और पेनल्टी को रद्द कर दिया है। अधिकरण ने कहा कि संबंधित अवधि में SBI मद्रास हाईकोर्ट के अंतरिम आदेशों का पालन कर रहा था, इसलिए उसे “डिफॉल्टर असेसी” नहीं माना जा सकता।
मामला उन LFC दावों से जुड़ा था जिनमें कर्मचारियों ने विदेश यात्रा को भी शामिल किया था। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2022 में फैसला दिया था कि विदेशी यात्रा वाले LTC/LFC दावे आयकर अधिनियम की धारा 10(5) के तहत छूट के पात्र नहीं हैं और ऐसे मामलों में नियोक्ता को धारा 192 के तहत TDS काटना चाहिए। इसके बाद आयकर विभाग ने SBI की विभिन्न शाखाओं के खिलाफ धारा 201(1) और 201(1A) के तहत कार्रवाई करते हुए टैक्स डिमांड और ब्याज लगाया था।
सुनवाई के दौरान SBI ने तर्क दिया कि मद्रास हाईकोर्ट ने 2015 के अंतरिम आदेश में स्पष्ट किया था कि LFC भुगतान को आय नहीं माना जाएगा और बैंक को उस पर TDS नहीं काटना है। ITAT ने माना कि बैंक एक वैध न्यायिक आदेश के अधीन कार्य कर रहा था और उसके लिए उस आदेश का पालन करना अनिवार्य था। अधिकरण ने कहा कि “धारा 192 के तहत TDS काटने का दायित्व न्यायालय के बाध्यकारी आदेशों के सामने अलग से नहीं देखा जा सकता।”
अधिकरण ने केरल हाईकोर्ट के एक पूर्व निर्णय का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि यदि किसी न्यायिक आदेश के कारण TDS नहीं काटा गया है, तो नियोक्ता को धारा 201 के तहत डिफॉल्टर नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर ITAT ने SBI के खिलाफ सभी टैक्स डिमांड, ब्याज और धारा 271C के तहत लगाई गई पेनल्टी को भी रद्द कर दिया।
यह फैसला उन नियोक्ताओं और संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिन्होंने किसी न्यायालय के आदेश के अनुपालन में TDS नहीं काटा था। अधिकरण ने स्पष्ट किया कि न्यायिक निर्देशों का पालन करने वाले संस्थानों पर बाद में डिफॉल्ट की कार्रवाई नहीं की जा सकती।
