चेन्नई स्थित सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क एवं सेवा कर अपीलीय अधिकरण (CESTAT) ने आयातित सामान के कथित कम मूल्यांकन (Undervaluation) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में आयातकों को बड़ी राहत देते हुए 11 करोड़ रुपये से अधिक की कस्टम ड्यूटी मांग, जब्ती, रिडेम्पशन फाइन और सभी दंडात्मक कार्रवाई को रद्द कर दिया है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि राजस्व विभाग और डीआरआई (Directorate of Revenue Intelligence) आरोपों को साबित करने के लिए कानूनी रूप से स्वीकार्य और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहे।
मामला चेन्नई की फर्मों स्पार्क लाइट्स और सूरज इम्पेक्स द्वारा चीन से लाइटिंग फिक्स्चर और संबंधित सामान के आयात से जुड़ा था। डीआरआई ने वर्ष 2015 में जांच शुरू करते हुए कंपनियों के परिसरों पर तलाशी ली और पेन ड्राइव तथा हार्ड डिस्क जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए। जांच एजेंसी का आरोप था कि इन इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और दर्ज बयानों से यह पता चलता है कि आयातित सामान का मूल्य कम दिखाकर कस्टम ड्यूटी की चोरी की गई।
जांच के आधार पर विभाग ने लगभग 8.10 करोड़ रुपये की ड्यूटी मांग स्पार्क लाइट्स और 3.14 करोड़ रुपये की मांग सूरज इम्पेक्स के खिलाफ उठाई थी। इसके साथ ही कस्टम अधिनियम, 1962 की धारा 112, 114A और 114AA के तहत भारी जुर्माने भी लगाए गए थे। कंपनी से जुड़े राजेश जैन पर भी अलग से दंड लगाया गया था।
हालांकि, CESTAT की दो सदस्यीय पीठ ने पाया कि पूरा मामला मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक डेटा और जांच के दौरान दर्ज बयानों पर आधारित था। ट्रिब्यूनल ने कहा कि कस्टम अधिनियम की धारा 138C के तहत इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने के लिए आवश्यक प्रमाणन और तकनीकी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। विभाग यह साबित नहीं कर सका कि जब्त किए गए डेटा की प्रामाणिकता, स्रोत और संरक्षण की प्रक्रिया विधिसम्मत थी।
ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केवल संदेह या अनुमान के आधार पर आयातकों द्वारा घोषित ट्रांजैक्शन वैल्यू को खारिज नहीं किया जा सकता। आदेश में कहा गया कि विभाग अतिरिक्त भुगतान, समानांतर चालान (Parallel Invoices) या विदेशी आपूर्तिकर्ताओं को किसी अतिरिक्त राशि के भुगतान का कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं कर पाया। ऐसे में कम मूल्यांकन का आरोप टिक नहीं सकता।
पीठ ने यह भी पाया कि विभाग ने कस्टम वैल्यूएशन नियम, 2007 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। आदेश में कहा गया कि यदि घोषित मूल्य को अस्वीकार किया जाता है तो वैल्यूएशन नियमों में निर्धारित क्रमिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है, लेकिन विभाग ने ऐसा नहीं किया और मनमाने तरीके से प्रति किलोग्राम निर्धारित दरों के आधार पर मूल्य तय कर लिया।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन पर भी ट्रिब्यूनल ने गंभीर टिप्पणी की। आयातकों का आरोप था कि विभाग ने इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की पूरी प्रतियां उपलब्ध नहीं कराईं और जिन व्यक्तियों के बयान पर भरोसा किया गया, उनका जिरह (Cross-Examination) का अवसर भी नहीं दिया गया। CESTAT ने माना कि ऐसे मामलों में पूर्ण दस्तावेज उपलब्ध कराना और जिरह का अवसर देना आवश्यक है। इन अधिकारों से वंचित किए जाने के कारण पूरी कार्यवाही प्रभावित हुई।
सीमावधि (Limitation) के मुद्दे पर भी ट्रिब्यूनल ने विभाग को झटका दिया। आयात वर्ष 2013 से 2015 के बीच हुए थे, जबकि कारण बताओ नोटिस नवंबर 2018 में जारी किया गया। ट्रिब्यूनल ने कहा कि विभाग यह साबित नहीं कर पाया कि आयातकों ने कोई तथ्य छिपाया था या धोखाधड़ी की थी। सभी आयात नियमित बिल ऑफ एंट्री के माध्यम से हुए थे और कई मामलों में कस्टम अधिकारियों ने उसी समय मूल्य का परीक्षण भी किया था। इसलिए विस्तारित समयसीमा (Extended Period) लागू करने का आधार नहीं बनता।
इन निष्कर्षों के आधार पर CESTAT ने कहा कि जब मूल ड्यूटी मांग ही टिकाऊ नहीं है तो माल की जब्ती, रिडेम्पशन फाइन और सभी दंडात्मक कार्रवाई भी स्वतः समाप्त हो जाती है। ट्रिब्यूनल ने राजेश जैन पर लगाए गए व्यक्तिगत जुर्माने को भी यह कहते हुए रद्द कर दिया कि उनके खिलाफ कोई स्वतंत्र और ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।
यह फैसला कस्टम जांच और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के उपयोग से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आदेश से स्पष्ट संदेश गया है कि केवल डिजिटल रिकॉर्ड या अप्रमाणित डेटा के आधार पर आयातकों के खिलाफ बड़ी कर मांगें नहीं उठाई जा सकतीं। विभाग को कानून में निर्धारित प्रक्रिया, साक्ष्य के मानकों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सख्ती से पालन करना होगा।
