अभिजीत अय्यर-मित्रा मामले में जज के खिलाफ सोशल मीडिया टिप्पणियों पर दिल्ली हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान से अवमानना कार्यवाही शुरू करने से किया इनकार

Delhi High Court

दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को उस मांग को खारिज कर दिया, जिसमें साकेत कोर्ट के एक न्यायाधीश के खिलाफ सोशल मीडिया पर की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों को लेकर स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) लेते हुए अवमानना कार्यवाही शुरू करने का आग्रह किया गया था। यह मामला टिप्पणीकार अभिजीत अय्यर-मित्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश पर रोक लगाने वाले सत्र न्यायाधीश के विरुद्ध ऑनलाइन आलोचना से जुड़ा है।

न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की एकलपीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता पर्सिवल बिलिमोरिया ने यह मुद्दा उठाया। उन्होंने अदालत को बताया कि सत्र न्यायाधीश द्वारा अभिजीत अय्यर-मित्रा को अंतरिम राहत दिए जाने के बाद सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ संगठित तरीके से ट्रोलिंग की गई और न्यायपालिका को भी निशाना बनाया गया।

बिलिमोरिया ने अदालत को बताया कि कई सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने न्यायाधीश और न्यायिक संस्थान के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। उनका कहना था कि न्यायालय के आदेश की सामग्री को संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत किया गया और इसके आधार पर न्यायाधीश के खिलाफ ऑनलाइन अभियान चलाया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शिकायतकर्ताओं से जुड़े कुछ लोगों ने इस अभियान को बढ़ावा दिया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेकर अवमानना कार्यवाही शुरू करने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि सोशल मीडिया पर न्यायाधीशों और न्यायिक आदेशों की आलोचना अब एक सामान्य घटना बन चुकी है और हर आलोचनात्मक टिप्पणी अवमानना की कार्रवाई का आधार नहीं बन सकती।

अदालत ने कहा कि यदि न्यायालय प्रत्येक नकारात्मक टिप्पणी पर संज्ञान लेने लगे, तो स्थिति व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाएगी। न्यायमूर्ति कृष्णा ने स्पष्ट किया कि यदि संबंधित न्यायिक अधिकारी को मामला गंभीर प्रतीत होता है, तो वह विधि के अनुसार अवमानना कार्यवाही के लिए संदर्भ भेज सकते हैं।

पीठ ने यह भी कहा कि बिना पर्याप्त आधार के अवमानना कार्यवाही शुरू करना और बाद में मामला न बनना भी न्यायिक संस्थानों के लिए प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि अवमानना कानून के तहत उपलब्ध सभी वैधानिक उपाय संबंधित पक्षों के लिए खुले हुए हैं।

यह विवाद 9 जून को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पुरुषोत्तम पाठक द्वारा दिए गए आदेश से जुड़ा है, जिसमें अभिजीत अय्यर-मित्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के मजिस्ट्रेट के आदेश पर रोक लगाई गई थी। सत्र न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि विवादित टिप्पणियां शायरी के रूप में थीं और उनमें किसी व्यक्ति का नाम स्पष्ट रूप से नहीं लिया गया था। अदालत ने माना कि भाषा और संदर्भ का विस्तृत परीक्षण पुनरीक्षण याचिका की अंतिम सुनवाई के दौरान किया जाएगा।

मूल विवाद न्यूज़लॉन्ड्री से जुड़ी पत्रकार मनीषा पांडे और छह अन्य पत्रकारों द्वारा दायर शिकायत से उत्पन्न हुआ था। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि अय्यर-मित्रा ने सोशल मीडिया पोस्ट और लेखों में उनके लिए अपमानजनक एवं लैंगिक रूप से आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया। इसके आधार पर मजिस्ट्रेट अदालत ने 22 अप्रैल को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 75 और 79 के तहत संज्ञेय अपराध पाए जाने पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था।

बाद में अय्यर-मित्रा ने इस आदेश को सत्र न्यायालय में चुनौती दी, जहां उन्हें अंतरिम राहत मिली। दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले उस राहत आदेश को पर्याप्त कारणों के अभाव में निरस्त कर मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेजा था। इसके बाद सत्र न्यायालय ने विस्तृत कारणों के साथ पुनः अंतरिम रोक जारी रखी।

अब दिल्ली हाईकोर्ट ने न्यायाधीश के खिलाफ सोशल मीडिया पर हुई आलोचना के आधार पर स्वतः संज्ञान अवमानना कार्यवाही शुरू करने से इनकार करते हुए कहा है कि कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपायों का सहारा लिया जा सकता है।