पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) के पद को लेकर चल रहे राजनीतिक और संवैधानिक विवाद पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने गुरुवार को महत्वपूर्ण सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि क्या विधानसभा अध्यक्ष किसी राजनीतिक दल की सहमति या मंजूरी के बिना किसी विधायक को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे सकते हैं, विशेषकर तब जब संबंधित दल ने किसी अन्य नेता को इस पद के लिए नामित किया हो।
न्यायमूर्ति कृष्णा राव की एकलपीठ उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें विधानसभा अध्यक्ष द्वारा तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता देने के फैसले को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि पार्टी ने आधिकारिक रूप से वरिष्ठ नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष के पद के लिए नामित किया था, लेकिन इसके बावजूद अध्यक्ष ने ऋतब्रत बनर्जी को मान्यता दे दी।
यह विवाद विधानसभा चुनावों में टीएमसी की हार के बाद पार्टी के भीतर उभरे असंतोष और बगावत से जुड़ा है। ऋतब्रत बनर्जी और उनके समर्थक विधायकों ने पार्टी नेतृत्व से अलग रुख अपनाते हुए दावा किया कि उन्हें टीएमसी के 57 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। इसी आधार पर विधानसभा अध्यक्ष रथीन्द्रनाथ बोस ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता प्रदान की थी।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता और टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी ने दलील दी कि अध्यक्ष का यह निर्णय संवैधानिक सिद्धांतों और संसदीय परंपराओं के विपरीत है। उन्होंने अदालत को बताया कि टीएमसी ने औपचारिक रूप से शोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त करने का निर्णय अध्यक्ष को सूचित किया था और किसी भी नेता प्रतिपक्ष का चयन राजनीतिक दल का विशेषाधिकार होता है।
उन्होंने कहा कि केवल विधायकों के एक समूह का समर्थन किसी व्यक्ति को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने का आधार नहीं हो सकता। राजनीतिक दल और उसके विधायी दल के बीच अंतर को रेखांकित करते हुए उन्होंने तर्क दिया कि अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व का होता है और अध्यक्ष को उसी के अनुरूप कार्रवाई करनी चाहिए।
याचिका में यह भी कहा गया कि पार्टी से निष्कासित व्यक्ति को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता देना लोकतांत्रिक व्यवस्था और दलगत अनुशासन की मूल भावना के खिलाफ है। इससे राजनीतिक दलों और उनके विधायी दलों के बीच संबंधों को लेकर गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़े होते हैं।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने भी प्रारंभिक तौर पर यह टिप्पणी की कि निष्कासन के बाद ऋतब्रत बनर्जी को पार्टी का समर्थन प्राप्त नहीं दिखता। अदालत ने विशेष रूप से इस पहलू पर विचार किया कि क्या विधानसभा अध्यक्ष राजनीतिक दल के निर्णय से अलग हटकर नेता प्रतिपक्ष को मान्यता दे सकते हैं।
हालांकि, याचिकाकर्ता द्वारा अध्यक्ष के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने की मांग को अदालत ने फिलहाल स्वीकार नहीं किया। इसके चलते ऋतब्रत बनर्जी अगले आदेश तक पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में कार्य करते रहेंगे।
यह मामला केवल एक राजनीतिक नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे विधानसभा अध्यक्ष की शक्तियों, निष्कासित विधायकों की स्थिति, राजनीतिक दल और उसके विधायी दल के अधिकारों तथा नेता प्रतिपक्ष की मान्यता से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या पर भी दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।
हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 16 जून को निर्धारित की है, जहां इस विवाद के कानूनी और संवैधानिक पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जाएगा।
