सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114A के तहत बलात्कार के मामलों में अनुमान को यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने कहा कि पीड़िता की गवाही के आधार पर दोषसिद्धि संभव है, लेकिन गवाही भरोसेमंद और अदालत के विश्वास के योग्य होनी चाहिए।
कोर्ट ने पाया कि पीड़िता के बयान में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास थे। उसने आरोपी के साथ भीड़भाड़ वाले इलाकों से लंबी यात्रा की, लेकिन मदद के लिए कोई शोर नहीं मचाया। मेडिकल जांच में भी कोई बाहरी या आंतरिक चोट नहीं मिली। कोर्ट ने कहा कि यदि उसी तथ्यात्मक आधार पर आरोपी को अपहरण के आरोप से बरी किया गया है, तो उसी बयान को आधार बनाकर बलात्कार के आरोप में दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के फैसलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि केवल योनि स्वैब में शुक्राणु की मौजूदगी अपने आप बलात्कार साबित नहीं करती। मामले में आरोपी परमजीत सिंह बेदी को पहले धारा 376 IPC के तहत 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।
