गंगा संरक्षण नियमों में बदलाव को चुनौती देने वाली याचिका पर NGT ने केंद्र से जवाब मांगा है। नो-कंस्ट्रक्शन जोन और बाढ़ क्षेत्र की परिभाषा पर सवाल उठे।

NGT - National Green Tribunal

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के संरक्षण से जुड़े नियमों में हाल में किए गए बदलावों को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नए अधिसूचना प्रावधानों के जरिए नदी के किनारे लागू महत्वपूर्ण निर्माण निषेध क्षेत्र को हटा दिया गया है, जिससे गंगा के बाढ़ क्षेत्र और पर्यावरणीय सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

NGT अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य अफरोज अहमद की पीठ ने इस महीने जारी अधिसूचना का संज्ञान लेते हुए केंद्र से जवाब मांगा। याचिका में दावा किया गया है कि संशोधित प्रावधान पूर्व में लागू पर्यावरणीय नियमों, NGT तथा संवैधानिक न्यायालयों के पूर्व निर्णयों, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 और मूल अधिसूचना में निर्धारित सुरक्षा उपायों के अनुरूप नहीं हैं।

याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया है कि मूल नियमों में गंगा और उसकी सहायक नदियों के आसपास जिस नो-कंस्ट्रक्शन जोन का प्रावधान था, उसे संशोधित अधिसूचना में हटा दिया गया है। याचिका के अनुसार, इस बदलाव से नदी के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण और अन्य गतिविधियों पर लागू पर्यावरणीय नियंत्रण कमजोर हो सकता है।

मामले में सक्रिय बाढ़ क्षेत्र यानी एक्टिव फ्लडप्लेन की परिभाषा को लेकर भी गंभीर आपत्ति जताई गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि संशोधित अधिसूचना में सक्रिय बाढ़ क्षेत्र निर्धारित करने के लिए “वन-इन-फाइव-ईयर रिटर्न पीरियड” का आधार अपनाया गया है। इसका अर्थ ऐसी बाढ़ की घटना से है जिसकी किसी एक वर्ष में घटित होने की अनुमानित संभावना 20 प्रतिशत होती है।

याचिका में दावा किया गया है कि इस तरह की परिभाषा अपनाने से संरक्षित बाढ़ क्षेत्र का दायरा प्रभावित हो सकता है और इसके परिणामस्वरूप गंगा तथा उसकी सहायक नदियों के किनारे निर्माण गतिविधियों पर लागू प्रतिबंधों में बदलाव आ सकता है।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा है कि गंगा की पारिस्थितिकी, नदी तंत्र, बाढ़ क्षेत्र और प्राकृतिक जल प्रवाह की सुरक्षा के लिए कड़े पर्यावरणीय मानकों की आवश्यकता है। उनके अनुसार, नदी के बाढ़ क्षेत्र में अनियंत्रित निर्माण से नदी की प्राकृतिक क्षमता प्रभावित होने के साथ-साथ पर्यावरणीय जोखिम भी बढ़ सकते हैं।

मामले में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 भी महत्वपूर्ण है। यह कानून केंद्र सरकार को पर्यावरण की गुणवत्ता की रक्षा और सुधार के लिए आवश्यक उपाय करने तथा पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों को नियंत्रित करने का अधिकार देता है। याचिका में इसी कानूनी ढांचे के संदर्भ में संशोधित अधिसूचना की वैधता और पर्यावरणीय प्रभावों की न्यायिक समीक्षा की मांग की गई है।

NGT ने मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी। उस दौरान केंद्र के जवाब और संशोधित नियमों को लेकर उठाए गए कानूनी एवं पर्यावरणीय सवालों पर आगे विचार किया जा सकता है।

इस मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि गंगा के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण और भूमि उपयोग से जुड़े नियम नदी संरक्षण, जैव विविधता, बाढ़ प्रबंधन और पर्यावरणीय संतुलन से सीधे जुड़े हैं। NGT का आगामी निर्णय गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे निर्माण गतिविधियों तथा बाढ़ क्षेत्र के संरक्षण के लिए लागू पर्यावरणीय मानकों को लेकर महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकता है।