दिल्ली हाई कोर्ट ने जिला अदालतों की आर्थिक अधिकार सीमा (पेक्यूनियरी जूरिस्डिक्शन) को 2 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 20 करोड़ रुपये करने के प्रस्ताव पर विचार कर रही सात सदस्यीय समिति की रिपोर्ट पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा आवश्यक है क्योंकि दिल्ली में सामान्य आवासीय संपत्तियों का मूल्य भी अब 2 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है, जिससे बड़ी संख्या में दीवानी मामले सीधे हाई कोर्ट में दायर हो रहे हैं।
न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (डीएचसीबीए), एशियन पेटेंट अटॉर्नीज एसोसिएशन और इंटरनेशनल ट्रेडमार्क एसोसिएशन अंतरिम राहत के लिए आवश्यक प्रथम दृष्टया मामला, सुविधा का संतुलन और अपूरणीय क्षति साबित नहीं कर सके।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सात सदस्यीय समिति केवल परामर्श और सिफारिश का कार्य कर रही है। समिति के पास न तो कोई न्यायिक अधिकार है और न ही कानून बनाने की शक्ति। यदि जिला अदालतों की आर्थिक अधिकार सीमा में बदलाव करना है तो इसके लिए संसद को दिल्ली हाई कोर्ट अधिनियम, 1966 में संशोधन करना होगा।
खंडपीठ ने कहा कि न्यायिक व्यवस्था से जुड़े विषयों पर हाई कोर्ट प्रशासनिक स्तर पर विचार कर अपनी सिफारिश संबंधित प्राधिकरण को भेज सकता है। ऐसी सिफारिशें अपने आप किसी कानून में बदलाव नहीं करतीं और न ही अदालतों के अधिकार क्षेत्र को बदल सकती हैं।
अदालत ने यह भी माना कि वर्ष 2015 में निर्धारित 2 करोड़ रुपये की सीमा पिछले एक दशक से नहीं बदली है, जबकि दिल्ली में शहरीकरण, संपत्तियों की कीमतों और व्यावसायिक गतिविधियों में भारी वृद्धि हुई है। इसके कारण संपत्ति, बंटवारे, कब्जे और घोषणा जैसे कई सामान्य दीवानी विवाद भी हाई कोर्ट तक पहुंच रहे हैं, जिससे मुकदमेबाजी महंगी और जटिल हो रही है।
हाई कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में पर्याप्त न्यायिक ढांचा उपलब्ध है और वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए आर्थिक अधिकार सीमा की संस्थागत समीक्षा उचित है। हालांकि अंतिम निर्णय संसद ही कानून में संशोधन करके ले सकती है।
अदालत ने अंतरिम राहत की सभी याचिकाएं खारिज कर दीं। समिति के गठन और परामर्श प्रक्रिया को चुनौती देने वाली मुख्य याचिकाओं पर अब 24 जुलाई 2026 को सुनवाई होगी।
