छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) को बड़ी राहत देते हुए राज्य सरकार को ₹23.23 करोड़ का स्टांप शुल्क और उपकर (सेस) चार सप्ताह के भीतर वापस करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कोयला ब्लॉक आवंटन को अवैध घोषित किए जाने के बाद उस आधार पर निष्पादित खनन पट्टा शुरू से ही विधि की दृष्टि में शून्य हो गया, इसलिए भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 की धारा 49 के तहत स्टांप शुल्क की वापसी का दावा स्वीकार्य है।
मामला पर्सा ईस्ट एवं कांता बसन (पीईकेबी) कोयला ब्लॉक से जुड़ा है। वर्ष 2012 में खनन पट्टा पंजीकृत कराने के लिए कंपनी ने करोड़ों रुपये का स्टांप शुल्क, सेस और पंजीयन शुल्क जमा किया था। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2014 में कोयला ब्लॉक आवंटन रद्द कर दिए, जिसके बाद कंपनी को उसी खदान के लिए नया पट्टा लेकर दोबारा स्टांप शुल्क देना पड़ा। इसके बाद कंपनी ने पहले जमा किए गए स्टांप शुल्क की वापसी की मांग की थी, जिसे स्टांप कलेक्टर ने अस्वीकार कर दिया था।
हाईकोर्ट ने स्टांप कलेक्टर का आदेश रद्द करते हुए कहा कि राज्य सरकार स्टांप शुल्क और सेस वापस करेगी। हालांकि न्यायालय ने पंजीयन शुल्क और ब्याज लौटाने की मांग स्वीकार नहीं की, क्योंकि इसके लिए कानून में कोई प्रावधान नहीं है। यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां किसी न्यायिक आदेश के कारण पहले से निष्पादित दस्तावेज बाद में विधिक रूप से शून्य हो जाते हैं।
