मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु की पांच विधानसभा सीटों पर उपचुनाव की अधिसूचना जारी करने से ईसीआई को 31 जुलाई तक रोका

The Rajpatra Law

मद्रास हाई कोर्ट ने निर्वाचन आयोग (ईसीआई) को तमिलनाडु की पांच रिक्त विधानसभा सीटों पर उपचुनाव की अधिसूचना जारी करने से 31 जुलाई तक रोक दिया है। अदालत ने कहा कि संबंधित विधायकों के चुनाव को चुनौती देने वाली लंबित चुनाव याचिकाओं से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक और वैधानिक प्रश्नों का पहले निस्तारण किया जाना आवश्यक है।

मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने शुक्रवार को तिरुनेलवेली के अधिवक्ता के. वेंकटाचलपति द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया।

ये रिक्तियां तिरुची ईस्ट, पेरुंदुरई, अंबासमुद्रम, विरालीमलाई और करूर विधानसभा क्षेत्रों के निर्वाचित विधायकों के इस्तीफे के बाद उत्पन्न हुई हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने पेरंबूर सीट बरकरार रखते हुए तिरुची ईस्ट सीट से इस्तीफा दिया था। वहीं, पूर्व एआईएडीएमके विधायक एस. जयकुमार, एसाक्की सुब्बैया, सी. विजयभास्कर और एम.आर. विजयभास्कर ने सत्तारूढ़ तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) में शामिल होने के बाद विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151ए के तहत इन सीटों को “स्पष्ट रिक्तियां” नहीं माना जा सकता, क्योंकि संबंधित विधायकों के निर्वाचन को चुनौती देने वाली चुनाव याचिकाएं पहले से हाई कोर्ट में लंबित हैं। इन याचिकाओं में न केवल संबंधित चुनावों को निरस्त करने, बल्कि चुनाव याचिकाकर्ताओं को विधिवत निर्वाचित विधायक घोषित करने की भी मांग की गई है।

याचिकाकर्ता ने संजीवैया बनाम निर्वाचन आयोग (1967), निर्वाचन आयोग बनाम तेलंगाना राष्ट्र समिति (2011) और प्रमोद लक्ष्मण गुढाढे बनाम निर्वाचन आयोग (2018) सहित सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव याचिकाओं के लंबित रहते उपचुनाव कराना स्थापित कानूनी सिद्धांतों के विपरीत होगा।

खंडपीठ ने कहा कि यदि उपचुनाव होने के बाद किसी लंबित चुनाव याचिका में अदालत किसी अन्य उम्मीदवार को वैध रूप से निर्वाचित विधायक घोषित कर देती है, तो एक ही विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का दावा दो व्यक्तियों द्वारा किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति गंभीर संवैधानिक जटिलताएं उत्पन्न करेगी, चुनाव प्रक्रिया की शुचिता को प्रभावित करेगी और सरकारी धन पर अनावश्यक बोझ डालेगी।

इसी आधार पर अदालत ने निर्वाचन आयोग को अगली सुनवाई तक इन पांच सीटों पर उपचुनाव की अधिसूचना जारी करने से रोक दिया।

राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता विजय नारायण ने तर्क दिया कि उन मामलों में अंतर किया जाना चाहिए, जहां चुनाव याचिका दायर होने से पहले विधायक इस्तीफा देता है और जहां इस्तीफा चुनाव याचिका दायर होने के बाद दिया जाता है। उन्होंने कहा कि एक बार इस्तीफा स्वीकार हो जाने पर सीट रिक्त हो जाती है और यदि इस्तीफे की तारीख तक कोई चुनाव याचिका लंबित नहीं थी, तो बाद में दायर याचिका निर्वाचन आयोग के वैधानिक दायित्व को प्रभावित नहीं कर सकती। उन्होंने यह भी कहा कि मतदाताओं को लंबे समय तक प्रतिनिधित्व से वंचित नहीं रखा जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जी. मसिलामणि ने जनहित याचिका की ग्राह्यता और याचिकाकर्ता की लोकस स्टैंडी पर सवाल उठाया। उनका कहना था कि निर्वाचन आयोग ने अभी तक उपचुनाव कराने का कोई अंतिम निर्णय या अधिसूचना जारी नहीं की है, इसलिए याचिका समय से पहले दायर की गई है।

निर्वाचन आयोग की ओर से अदालत को बताया गया कि कई चुनाव याचिकाओं में आयोग को अभी तक नोटिस प्राप्त नहीं हुए हैं और आयोग को उनमें मांगी गई राहतों की जानकारी भी नहीं है। साथ ही, कुछ चुनाव याचिकाओं की ग्राह्यता तथा प्रक्रियागत त्रुटियों को दूर करने से जुड़े प्रश्न भी अभी हाई कोर्ट की रजिस्ट्री के समक्ष लंबित हैं।

खंडपीठ ने लोकस स्टैंडी संबंधी प्रारंभिक आपत्ति को खारिज करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और चुनावी शुचिता से जुड़े मामलों को केवल तकनीकी आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता से जुड़े मुद्दे जनहित याचिका के माध्यम से भी न्यायिक समीक्षा के योग्य हैं।

अदालत ने माना कि इस्तीफों से उत्पन्न रिक्तियों पर लंबित चुनाव याचिकाओं के प्रभाव से जुड़े कानूनी प्रश्नों पर विस्तृत सुनवाई आवश्यक है। इसलिए सभी पक्षकारों को 31 जुलाई तक अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया। मामले की अगली सुनवाई भी 31 जुलाई को होगी और तब तक निर्वाचन आयोग इन पांच विधानसभा सीटों पर उपचुनाव की अधिसूचना जारी नहीं कर सकेगा।