नई दिल्ली: राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (एनसीडीआरसी) ने एयर इंडिया को बड़ा झटका देते हुए एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि बिजनेस क्लास का अतिरिक्त किराया लेने के बाद भी यात्री को खराब और न झुकने वाली सीट उपलब्ध कराना स्पष्ट रूप से “सेवा में कमी” है। आयोग ने एयर इंडिया और शिकायतकर्ता, दोनों की अपीलें खारिज करते हुए उत्तर प्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें एयर इंडिया को बिजनेस क्लास का किराया लौटाने, ब्याज, मुआवजा और वाद व्यय का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।
मामला सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी न्यायमूर्ति राजेश चंद्रा से जुड़ा है, जिन्होंने अपनी पत्नी के साथ दिल्ली से सैन फ्रांसिस्को की यात्रा के लिए एयर इंडिया की टिकट बुक की थी। गर्दन और रीढ़ संबंधी गंभीर चिकित्सीय समस्याओं के कारण उन्होंने अतिरिक्त राशि देकर दोनों टिकटों को इकोनॉमी क्लास से बिजनेस क्लास में अपग्रेड कराया था। हालांकि वापसी यात्रा के दौरान उन्हें जो बिजनेस क्लास सीट आवंटित की गई, वह खराब थी और पीछे की ओर झुक नहीं रही थी। शिकायत के अनुसार, कई बार अनुरोध करने के बावजूद एयरलाइन ने न तो दूसरी सीट उपलब्ध कराई और न ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था की, जबकि बिजनेस क्लास में कुछ सीटें खाली होने का दावा किया गया।
शिकायतकर्ता का कहना था कि लगभग 15 घंटे की लंबी उड़ान के दौरान खराब सीट के कारण उनकी पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याएं और बढ़ गईं। भारत लौटने के बाद उन्हें चिकित्सकीय उपचार, दवाइयों और फिजियोथेरेपी की आवश्यकता पड़ी। इसके बाद उन्होंने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाते हुए एयर इंडिया पर उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत सेवा में कमी का आरोप लगाया।
उत्तर प्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग ने शिकायत आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए एयर इंडिया को बिजनेस क्लास का ₹1,69,002 किराया 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटाने, मानसिक और शारीरिक पीड़ा के लिए ₹20 लाख का मुआवजा तथा ₹20,000 वाद व्यय देने का आदेश दिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए एयर इंडिया ने राष्ट्रीय आयोग में अपील दायर की, जबकि शिकायतकर्ता ने मुआवजा बढ़ाने की मांग की।
एनसीडीआरसी ने एयर इंडिया की सभी प्रमुख आपत्तियों को खारिज कर दिया। आयोग ने कहा कि यदि एयरलाइन को राज्य आयोग के अधिकार क्षेत्र या शिकायत की ग्राह्यता पर आपत्ति थी, तो उसे प्रारंभिक चरण में उठाया जाना चाहिए था। अपील के स्तर पर पहली बार ऐसे तकनीकी आधार उठाकर मामले को चुनौती नहीं दी जा सकती। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल किसी कानूनी प्रावधान का गलत उल्लेख होने से वास्तविक उपभोक्ता शिकायत समाप्त नहीं हो जाती, यदि तथ्यों से सेवा में कमी स्पष्ट रूप से साबित होती हो।
आयोग ने अपने आदेश में कहा, “यदि शिकायत में वर्णित तथ्यों से सेवा में कमी का स्पष्ट मामला बनता है, तो केवल किसी कानूनी प्रावधान का गलत उल्लेख या गलत नामकरण उपभोक्ता के वैध अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकता।”
मेरिट के आधार पर भी आयोग ने माना कि एयर इंडिया अतिरिक्त शुल्क लेने के बावजूद बिजनेस क्लास की मूल सुविधा, अर्थात सही ढंग से काम करने वाली रिक्लाइनिंग सीट, उपलब्ध कराने में विफल रही। आयोग ने कहा कि शिकायतकर्ता ने अपने आरोपों के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए, जबकि एयर इंडिया उनकी बात को प्रभावी ढंग से खंडित नहीं कर सकी। आयोग ने यह भी कहा कि लंबी अंतरराष्ट्रीय उड़ान में खराब सीट के कारण यात्री को गंभीर असुविधा, शारीरिक कष्ट और कठिनाई का सामना करना पड़ा, जो सेवा में कमी की श्रेणी में आता है।
हालांकि शिकायतकर्ता ने मुआवजा बढ़ाने की मांग की थी, आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि उपभोक्ता मामलों में मुआवजा वास्तविक नुकसान और पीड़ा के अनुपात में होना चाहिए। आयोग के अनुसार राज्य आयोग द्वारा किराया वापसी, ब्याज, मानसिक एवं शारीरिक पीड़ा के लिए मुआवजा और वाद व्यय का जो संतुलित आदेश दिया गया है, उसमें किसी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
इस फैसले के साथ एनसीडीआरसी ने दोनों पक्षों की अपीलें खारिज कर दीं और उत्तर प्रदेश राज्य उपभोक्ता आयोग के आदेश को बरकरार रखा। यह निर्णय उन हवाई यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो प्रीमियम श्रेणी की सेवाओं के लिए अतिरिक्त भुगतान करते हैं। आयोग ने स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि एयरलाइन वादा की गई मूल सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराती है, तो उसे उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत जवाबदेह ठहराया जा सकता है।
