सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: नगर निकाय चुनावों पर लागू नहीं होगा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, गलत संपत्ति विवरण पर अन्य कानूनों के तहत हो सकती है कार्रवाई

Supreme Court of India

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) के प्रावधान नगर निगम, नगर पालिका और अन्य स्थानीय निकायों के चुनावों पर लागू नहीं होते। यह कानून केवल संसद और राज्य विधानमंडलों के चुनावों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया है। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को अपनी संपत्ति और अन्य आवश्यक जानकारियों का सही एवं पूर्ण खुलासा करना अनिवार्य है। यदि कोई उम्मीदवार गलत जानकारी देता है या महत्वपूर्ण तथ्य छिपाता है, तो उसके विरुद्ध अन्य लागू आपराधिक कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

यह फैसला गुजरात में वर्ष 2015 के नगर निकाय चुनाव से जुड़े एक मामले में आया। मामले में एक महिला प्रत्याशी पर आरोप था कि उसने नामांकन के दौरान दाखिल किए गए शपथपत्र में अपने पति के स्वामित्व वाली कुछ अचल संपत्तियों का उल्लेख नहीं किया। इस कथित चूक के आधार पर उसके विरुद्ध जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125ए के तहत आपराधिक कार्यवाही शुरू की गई थी।

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अधिनियम के प्रावधानों का परीक्षण करते हुए कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में “चुनाव” की परिभाषा केवल संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनावों तक सीमित है। चूंकि नगर निकाय चुनाव संबंधित राज्य कानूनों के तहत कराए जाते हैं, इसलिए इन चुनावों में अधिनियम की दंडात्मक धाराओं का उपयोग नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि संबंधित नगर निकाय कानून में गलत जानकारी देने के लिए अलग से दंड का प्रावधान नहीं है, तो ऐसे मामलों में भारतीय दंड कानून या अन्य लागू विधिक प्रावधानों के तहत अभियोजन चलाया जा सकता है। इसलिए स्थानीय निकाय चुनावों में उम्मीदवारों की जवाबदेही समाप्त नहीं होती।

सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति के खुलासे के मुद्दे पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने उस तर्क को अस्वीकार कर दिया कि केवल संयुक्त स्वामित्व वाली संपत्तियों का ही खुलासा करना आवश्यक है। न्यायालय ने कहा कि निर्धारित शपथपत्र प्रारूप के अनुसार उम्मीदवार को अपनी, अपने पति या पत्नी तथा आश्रितों की सभी संपत्तियों का विवरण देना अनिवार्य है, चाहे वह संपत्ति जीवनसाथी के एकल स्वामित्व में ही क्यों न हो।

मामले में न्यायालय ने यह भी माना कि मजिस्ट्रेट ने गलत कानूनी प्रावधान के तहत संज्ञान लिया था। हालांकि, केवल गलत धारा का उल्लेख होने से पूरी कार्यवाही स्वतः अवैध नहीं हो जाती, यदि न्यायालय के पास मामले की सुनवाई का अधिकार है और इससे आरोपी को कोई वास्तविक नुकसान नहीं पहुंचा है।

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत संज्ञान लेने के आदेश को निरस्त करते हुए मामला पुनर्विचार के लिए मजिस्ट्रेट के पास भेज दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने आरोपों के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है और सभी तथ्यात्मक एवं कानूनी प्रश्नों का निर्णय संबंधित न्यायालय कानून के अनुसार करेगा।