आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (आईटीएटी) की कोलकाता पीठ ने संपत्ति बिक्री से जुड़े पूंजीगत लाभ (कैपिटल गेन) विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि कोई करदाता स्टाम्प ड्यूटी मूल्यांकन पर आपत्ति जताता है और विभागीय मूल्यांकन अधिकारी (डीवीओ) से मूल्यांकन कराने की मांग करता है, तो आकलन अधिकारी (एओ) उस अनुरोध को मनमाने ढंग से खारिज नहीं कर सकता। न्यायाधिकरण ने माना कि आयकर अधिनियम की धारा 50सी(2) के तहत ऐसे मामलों में डीवीओ को संदर्भित करना वैधानिक दायित्व है।
मामला पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी निवासी तपन दास से संबंधित है, जिन्होंने आकलन वर्ष 2014-15 के लिए राष्ट्रीय फेसलेस अपील केंद्र (एनएफएसी) के आदेश को चुनौती दी थी। करदाता ने अपनी आयकर रिटर्न में 4.55 लाख रुपये की आय घोषित की थी। बाद में सीमित जांच के दौरान आयकर विभाग ने भूमि बिक्री से प्राप्त दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ (लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन) में 63.52 लाख रुपये की अतिरिक्त आय जोड़ते हुए 16 दिसंबर 2016 को आकलन आदेश पारित किया था। प्रथम अपीलीय प्राधिकारी ने भी इस जोड़ को बरकरार रखा था।
अपील की सुनवाई के दौरान करदाता ने तर्क दिया कि संपत्ति के मूल्यांकन को लेकर विवाद होने के बावजूद आकलन अधिकारी ने मामले को विभागीय मूल्यांकन अधिकारी के पास नहीं भेजा। उनका कहना था कि धारा 50सी(2) स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि यदि करदाता स्टाम्प मूल्यांकन को चुनौती देता है, तो निष्पक्ष मूल्य निर्धारण के लिए डीवीओ की राय ली जानी चाहिए। इसके बावजूद उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया गया, जिससे कानून का उल्लंघन हुआ।
वहीं, आयकर विभाग की ओर से कहा गया कि आकलन विधिसम्मत तरीके से किया गया है और करदाता अपनी आय के स्रोतों को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर सका। इसलिए आदेश में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद न्यायाधिकरण ने पाया कि करदाता ने वास्तव में डीवीओ को संदर्भित करने का अनुरोध किया था, लेकिन आकलन अधिकारी ने उसे अस्वीकार कर दिया। पीठ ने कहा कि जब कोई करदाता संपत्ति के मूल्यांकन पर आपत्ति उठाता है और डीवीओ से मूल्यांकन की मांग करता है, तो आकलन अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह धारा 50सी(2) के अनुरूप कार्रवाई करे।
न्यायाधिकरण ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा, “जब करदाता संपत्ति के मूल्यांकन पर विवाद करता है और डीवीओ को संदर्भित करने का अनुरोध करता है, तब आकलन अधिकारी धारा 50सी(2) के तहत मामले को डीवीओ के पास भेजने के लिए बाध्य होता है।” पीठ ने माना कि इस मामले में आकलन अधिकारी ने कानूनी प्रावधान का पालन नहीं किया।
इन परिस्थितियों में आईटीएटी ने मामला पुनः आकलन अधिकारी को भेजते हुए निर्देश दिया कि धारा 50सी(2) के प्रावधानों का पालन किया जाए और आवश्यक मूल्यांकन कराया जाए। साथ ही करदाता को भी संपत्ति खरीद में प्रयुक्त धनराशि के स्रोत को प्रमाणित करने का निर्देश दिया गया है। इसके बाद नए सिरे से आकलन आदेश पारित किया जाएगा।
यह फैसला उन करदाताओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो संपत्ति बिक्री के मामलों में स्टाम्प ड्यूटी मूल्यांकन और वास्तविक बाजार मूल्य के बीच अंतर को लेकर विवाद का सामना करते हैं। न्यायाधिकरण ने स्पष्ट संकेत दिया है कि कर प्रशासन को कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा और करदाताओं को उपलब्ध वैधानिक सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता। इससे भविष्य में ऐसे मामलों में निष्पक्ष मूल्यांकन सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
