राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (एनसीडीआरसी) ने अभिनेता सलमान खान के खिलाफ जमानती वारंट जारी करने के मामले में जयपुर जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की है। आयोग ने कहा कि जिला आयोग ने कानून के अनुरूप न्यायिक विवेक का प्रयोग नहीं किया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना कठोर एवं दंडात्मक आदेश पारित कर दिए। एनसीडीआरसी ने स्पष्ट किया कि किसी भी अंतरिम आदेश से पहले यह देखना आवश्यक है कि शिकायत में प्रथमदृष्टया ऐसा मामला बनता भी है या नहीं।
न्यायमूर्ति ए. पी. साही की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें सदस्य भरतकुमार पंड्या भी शामिल थे, ने कहा कि जिला आयोग ने यह जांचने का भी प्रयास नहीं किया कि विवादित विज्ञापन वास्तव में भ्रामक विज्ञापन है या फिर छद्म विज्ञापन (सरोगेट विज्ञापन)। आयोग ने कहा कि बिना किसी प्रारंभिक परीक्षण के यह निष्कर्ष निकाल लिया गया कि संबंधित विज्ञापन तंबाकू उत्पाद का अप्रत्यक्ष प्रचार कर रहा है, जबकि उत्पाद की प्रकृति पर भी कोई प्रथमदृष्टया राय दर्ज नहीं की गई।
एनसीडीआरसी ने कहा कि जिला आयोग ने ऐसे आदेश पारित किए मानो सलमान खान और राजश्री पान मसाला पहले ही उपभोक्ता संरक्षण कानून का उल्लंघन कर चुके हों, जबकि मामले में न तो साक्ष्य दर्ज हुए थे और न ही सुनवाई शुरू हुई थी। आयोग ने यह भी कहा कि जिला आयोग और राजस्थान राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग दोनों ही मूल विवाद से भटक गए और यह तय करने के बजाय कि शिकायत कानूनी रूप से विचारणीय है या नहीं, कार्यवाही को सलमान खान के हस्ताक्षरों की सत्यता जैसे मुद्दों तक पहुंचा दिया।
यह विवाद वर्ष 2025 में जयपुर के अधिवक्ता योगेंद्र सिंह बड़ियाल द्वारा दायर उपभोक्ता शिकायत से शुरू हुआ था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि केसर युक्त चांदी की परत वाली इलायची के विज्ञापन के माध्यम से राजश्री पान मसाला का अप्रत्यक्ष प्रचार किया जा रहा है, जिससे उपभोक्ताओं को भ्रमित किया जा रहा है। शिकायतकर्ता ने इसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 तथा सिगरेट एवं अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 के प्रावधानों का उल्लंघन बताते हुए विज्ञापन के प्रसारण पर रोक लगाने की मांग की थी।
शिकायत के साथ अंतरिम राहत का आवेदन भी प्रस्तुत किया गया था। यद्यपि मामले की सुनवाई 15 जनवरी 2026 को निर्धारित थी, लेकिन जिला आयोग ने 6 जनवरी 2026 को ही मामले को सूचीबद्ध कर एकपक्षीय अंतरिम आदेश पारित करते हुए राजश्री पान मसाला और सलमान खान को संबंधित विज्ञापन के प्रसारण से रोक दिया। सलमान खान का कहना था कि यह आदेश पारित करने से पहले उन्हें न तो शिकायत की प्रति दी गई थी और न ही अंतरिम आवेदन की सूचना मिली थी।
इसके बाद सलमान खान ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से आयोग में उपस्थित होकर शिकायत की विचारणीयता को चुनौती दी। उन्होंने दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के तहत आवेदन दायर करते हुए कहा कि संबंधित विज्ञापन केवल केसर स्वाद वाली चांदी की परतयुक्त इलायची का है, जिस पर स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि उसमें न तंबाकू है और न ही निकोटिन। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि भ्रामक विज्ञापनों से जुड़े मामलों की जांच और कार्रवाई का अधिकार केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण के पास है।
इसके बावजूद शिकायतकर्ता ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 72 के तहत अंतरिम आदेश के कथित उल्लंघन का आवेदन प्रस्तुत किया। उसी दिन, बिना सलमान खान को सुनवाई का अवसर दिए, जिला आयोग ने उनके विरुद्ध जमानती वारंट जारी कर दिए। इतना ही नहीं, आयोग ने उनके हस्ताक्षरों की फोरेंसिक जांच कराने की अनुमति भी दे दी और बाद में वारंट के क्रियान्वयन के लिए जयपुर पुलिस आयुक्त और उप पुलिस आयुक्त को निर्देश देते हुए एक विशेष कार्यबल के गठन का आदेश भी पारित किया।
इन आदेशों को चुनौती देते हुए सलमान खान और राजश्री पान मसाला ने राजस्थान राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग का रुख किया। राज्य आयोग ने प्रारंभ में जिला आयोग को गिरफ्तारी वारंट जारी करने से रोका और सलमान खान की आपत्ति पर शीघ्र निर्णय देने का निर्देश दिया, लेकिन बाद में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। इसके बाद दोनों पक्ष राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग पहुंचे।
एनसीडीआरसी ने अपने आदेश में कहा कि संबंधित विज्ञापन में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि उत्पाद में तंबाकू और निकोटिन नहीं है। इसके बावजूद जिला आयोग और राज्य आयोग ने इस महत्वपूर्ण तथ्य पर कोई विचार नहीं किया और न ही यह दर्ज किया कि प्रथमदृष्टया यह विज्ञापन कानून की दृष्टि में भ्रामक या छद्म विज्ञापन माना जा सकता है।
आयोग ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 38(8) का उल्लेख करते हुए कहा कि अंतरिम राहत प्रदान करते समय उपभोक्ता आयोगों को न्यायिक विवेक का प्रयोग करना आवश्यक है। किसी भी एकपक्षीय आदेश से पहले उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर प्रथमदृष्टया संतुष्टि दर्ज की जानी चाहिए। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि अंतरिम आदेश ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे अंतिम राहत पहले ही प्रदान कर दी जाए या यह मान लिया जाए कि कथित कानून उल्लंघन सिद्ध हो चुका है।
एनसीडीआरसी ने यह भी सवाल उठाया कि जब सलमान खान अपने अधिवक्ता के माध्यम से आयोग के समक्ष उपस्थित हो चुके थे, तब उनके हस्ताक्षरों की फोरेंसिक जांच कराने और वारंट के क्रियान्वयन के लिए विशेष कार्यबल गठित करने की आवश्यकता क्या थी। आयोग ने कहा कि इस प्रकार की कार्रवाई न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं कही जा सकती।
राष्ट्रीय आयोग ने यह भी ध्यान में रखा कि 7 अप्रैल 2026 को राजस्थान उच्च न्यायालय ने जिला आयोग और राज्य आयोग के आदेशों के साथ-साथ उपभोक्ता शिकायत की आगे की कार्यवाही पर भी रोक लगा दी थी। इस स्थिति में एनसीडीआरसी ने कहा कि सलमान खान को उच्च न्यायालय के समक्ष उपलब्ध कानूनी उपाय अपनाना चाहिए। आयोग ने अपनी कार्यवाही समाप्त करते हुए जयपुर जिला उपभोक्ता आयोग को निर्देश दिया कि वह राजस्थान उच्च न्यायालय के अंतिम आदेश तक मामले में कोई आगे की कार्रवाई न करे।
