राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (एनसीएलएटी), चेन्नई पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि ऋण समझौते और अन्य दस्तावेजों से किसी व्यक्ति की गारंटर के रूप में भूमिका साबित होती है, तो केवल अलग गारंटी डीड रिकॉर्ड पर न होने से उसके खिलाफ दिवाला कार्यवाही अमान्य नहीं होगी।
मामला टाटा कैपिटल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड द्वारा फर्नेस फैब्रिका (इंडिया) लिमिटेड को दिए गए करीब 39.60 करोड़ रुपये के ऋण से जुड़ा था। कंपनी के ऋण खाते के एनपीए घोषित होने के बाद वित्तीय लेनदार ने व्यक्तिगत गारंटर रईज़ बशीरुद्दीन के खिलाफ दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 की धारा 95 के तहत कार्यवाही शुरू की थी।
अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि 30 मई 2019 की मूल गारंटी डीड रिकॉर्ड पर पेश नहीं की गई, इसलिए उसे व्यक्तिगत गारंटर नहीं माना जा सकता। हालांकि, एनसीएलएटी ने पाया कि अपीलकर्ता स्वयं ऋण समझौते पर गारंटर के रूप में हस्ताक्षरकर्ता था और उसने गारंटी से जुड़े दस्तावेजों के अस्तित्व से भी इनकार नहीं किया था।
अधिकरण ने कहा कि गारंटी डीड का उद्देश्य ऋण के लिए सुरक्षा और गारंटर की जिम्मेदारी स्थापित करना होता है। जब ऋण समझौते में ही गारंटर की भूमिका और दायित्व स्पष्ट रूप से दर्ज हों तथा उस पर उसके हस्ताक्षर मौजूद हों, तब अलग गारंटी डीड का अभाव कार्यवाही को प्रभावित नहीं करता।
पीठ ने यह भी कहा कि “अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण अपनाकर केवल दस्तावेज की अनुपस्थिति के आधार पर गारंटर की जिम्मेदारी से इनकार नहीं किया जा सकता।” अधिकरण ने माना कि उपलब्ध दस्तावेजों से व्यक्तिगत गारंटर की स्थिति और उसकी देनदारी पर्याप्त रूप से सिद्ध होती है।
इन्हीं कारणों से एनसीएलएटी ने अपील को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया और व्यक्तिगत गारंटर के खिलाफ शुरू की गई दिवाला समाधान प्रक्रिया को बरकरार रखा। यह फैसला वित्तीय संस्थानों और व्यक्तिगत गारंटरों दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि गारंटर की जिम्मेदारी तय करने में केवल औपचारिक दस्तावेज ही नहीं, बल्कि संपूर्ण लेन-देन और संबंधित अभिलेखों को भी महत्व दिया जाएगा।
