बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आदिवासी भूमि की सुरक्षा से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी भूमि हस्तांतरण में धोखाधड़ी, बेनामी लेनदेन या गैर-आदिवासी के कब्जे का आरोप हो तो केवल इस आधार पर मामला खारिज नहीं किया जा सकता कि मूल बिक्री दो आदिवासियों के बीच हुई थी। न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 170-बी के तहत सक्षम राजस्व अधिकारी को विस्तृत जांच करना अनिवार्य है। यह फैसला आदिवासी भूमि संरक्षण कानूनों की व्यापक व्याख्या करने वाला माना जा रहा है।
न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने हरिशंकर बनाम रंगलाल एवं अन्य (डब्ल्यूपीसी क्रमांक 429/2022, 2026:CGHC:33371) में सुनवाई करते हुए वर्ष 2000 में एसडीओ और वर्ष 2003 में अतिरिक्त कलेक्टर द्वारा पारित आदेशों के साथ-साथ वर्ष 2021 में आयुक्त, सरगुजा द्वारा पारित उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसमें भूमि को सीधे आदिवासी पक्षकार के पक्ष में वापस करने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने पूरा विवाद दोबारा सुनवाई के लिए संबंधित एसडीओ को भेजते हुए तीन महीने के भीतर साक्ष्यों के आधार पर नया निर्णय देने का निर्देश दिया।
मामला सूरजपुर जिले की उस कृषि भूमि से जुड़ा है, जिसे वर्ष 1968 में मूल आदिवासी भूमिधर मनसाई गोंड ने पंजीकृत विक्रय पत्र के माध्यम से सोनझरिया बाई के नाम बेचा था। बाद में सोनझरिया बाई की मृत्यु के बाद भूमि उनके गैर-आदिवासी पति सरजू अहीर के नाम दर्ज हो गई और वर्ष 2003 में उन्होंने यह भूमि हरिशंकर को बेच दी। इसके बाद मनसाई गोंड के पुत्र रंगलाल ने आरोप लगाया कि पूरी प्रक्रिया के माध्यम से आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासी के कब्जे में पहुंचाया गया और यह धारा 170-बी के उद्देश्य के विपरीत है।
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 170-बी का उद्देश्य केवल प्रत्यक्ष अवैध हस्तांतरण रोकना नहीं, बल्कि ऐसे सभी मामलों की जांच करना है जिनमें आदिवासी भूमि पर धोखाधड़ी या छलपूर्वक गैर-आदिवासी का कब्जा स्थापित किया गया हो। न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के भाईजी बनाम उपखंड अधिकारी फैसले का हवाला देते हुए कहा कि “धारा 170-बी आदिवासी से गैर-आदिवासी के बीच हुए हस्तांतरण तक सीमित नहीं है, बल्कि आदिवासियों के बीच हुए लेनदेन की भी जांच की जा सकती है यदि धोखाधड़ी का आरोप हो।”
न्यायालय ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि यदि किसी आदिवासी महिला की मृत्यु के बाद उसका गैर-आदिवासी पति उत्तराधिकारी बन जाता है तो केवल इसी कारण भूमि अपना संरक्षित स्वरूप नहीं खो देती। ऐसी भूमि को गैर-आदिवासी के पक्ष में हस्तांतरित करने से पहले धारा 165(6) में निर्धारित वैधानिक सुरक्षा और आवश्यक अनुमति का पालन करना अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि आदिवासी भूमि संरक्षण से जुड़े कानूनों की व्याख्या हमेशा उनके उद्देश्य को आगे बढ़ाने वाली होनी चाहिए, न कि उन्हें कमजोर करने वाली।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी माना कि आयुक्त ने बिना विधिवत जांच कराए सीधे भूमि वापस करने का आदेश देकर अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर निर्णय दिया। न्यायालय के अनुसार पहले सक्षम एसडीओ को पक्षकारों के मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य दर्ज कर यह तय करना होगा कि वास्तव में कोई धोखाधड़ी हुई थी या नहीं। इसी कारण पूरा मामला नए सिरे से जांच के लिए वापस भेजा गया है। अदालत ने सभी पक्षकारों को 10 अगस्त 2026 को एसडीओ के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश भी दिया है।
यह फैसला छत्तीसगढ़ में आदिवासी भूमि विवादों की सुनवाई के लिए महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। इससे स्पष्ट हो गया है कि राजस्व अधिकारी केवल विक्रय पत्र देखकर निर्णय नहीं ले सकते, बल्कि वास्तविक कब्जे, कथित धोखाधड़ी, बेनामी लेनदेन और कानून द्वारा प्रदत्त आदिवासी संरक्षण के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए विस्तृत जांच करना उनकी कानूनी जिम्मेदारी है।
