भारत की न्यायिक व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां न्याय की उपलब्धता और न्याय की गति, दोनों ही गंभीर चर्चा के विषय हैं। देशभर की अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं। अनेक वाद ऐसे हैं जो वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इस स्थिति में केवल नए न्यायालयों की स्थापना या न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त समाधान नहीं हो सकता। आवश्यकता ऐसे वैकल्पिक तंत्रों की भी है जो विवादों को मुकदमे में बदलने से पहले ही सुलझा दें और जहां मुकदमे चल रहे हों, वहां उन्हें सौहार्दपूर्ण ढंग से समाप्त करने का अवसर प्रदान करें।
इसी पृष्ठभूमि में दुर्ग जिला न्यायालय द्वारा संचालित “90 दिवसीय मध्यस्थता अभियान – मीडिएशन फॉर द नेशन : समाधान और सद्भाव की यात्रा” एक महत्वपूर्ण प्रयोग के रूप में सामने आया। 1 जुलाई 2025 से 7 अक्टूबर 2025 तक संचालित यह अभियान केवल प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि न्याय की उस वैकल्पिक अवधारणा का व्यवहारिक उदाहरण था जिसमें संघर्ष के स्थान पर संवाद और मुकदमेबाजी के स्थान पर सहमति को महत्व दिया गया।
इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें मध्यस्थता को केवल एक कानूनी प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन के साधन के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया गया। अभियान का मूल संदेश “समझौते से समाधान, रिश्तों में सम्मान” अपने आप में इस सोच को प्रतिबिंबित करता है कि न्याय केवल निर्णय सुनाने का नाम नहीं है, बल्कि समाज में विश्वास और सद्भाव बनाए रखने की प्रक्रिया भी है।
महात्मा गांधी ने कहा था कि न्यायालयों में वर्षों तक चलने वाले मुकदमे केवल समय और धन की बर्बादी नहीं होते, बल्कि वे मानवीय संबंधों की ऊष्मा भी समाप्त कर देते हैं। अभियान की स्मारिका में गांधीजी के इसी विचार को आधार बनाकर मध्यस्थता की प्रासंगिकता को रेखांकित किया गया है। वास्तव में यदि किसी पारिवारिक विवाद, पड़ोसी विवाद, संपत्ति विवाद या व्यापारिक मतभेद का समाधान बातचीत से हो जाए, तो वह न्यायालय के निर्णय से कहीं अधिक प्रभावी और स्थायी होता है।
भारत की परंपरा भी इसी विचार का समर्थन करती है। गांवों की पंचायतें, सामाजिक बैठकों में समझौते और समुदाय आधारित विवाद समाधान की व्यवस्थाएं सदियों से भारतीय समाज का हिस्सा रही हैं। आधुनिक मध्यस्थता इसी परंपरा का विधिक और संस्थागत रूप है। अंतर केवल इतना है कि अब इस प्रक्रिया को प्रशिक्षित मध्यस्थों और न्यायिक निगरानी के साथ व्यवस्थित तरीके से संचालित किया जा रहा है।
अभियान से जुड़ी सामग्री बताती है कि मध्यस्थता के माध्यम से न्यायालयों के भार को कम करने, विवादों का शीघ्र समाधान उपलब्ध कराने, सामाजिक सद्भाव को बढ़ाने और नागरिकों का न्याय व्यवस्था पर विश्वास मजबूत करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। विशेष रूप से पारिवारिक विवाद, वैवाहिक मतभेद, भरण-पोषण, संपत्ति विभाजन, व्यावसायिक अनुबंध, साझेदारी विवाद तथा समझौता योग्य आपराधिक मामलों को मध्यस्थता के लिए उपयुक्त माना गया।
मेरे विचार से मध्यस्थता की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि इसमें कोई पक्ष पराजित नहीं होता। परंपरागत मुकदमे में एक पक्ष की जीत और दूसरे की हार निश्चित होती है। इसके विपरीत मध्यस्थता में दोनों पक्ष अपनी आवश्यकताओं, अपेक्षाओं और चिंताओं को सामने रखते हैं तथा एक ऐसे समाधान तक पहुंचते हैं जिसे वे स्वेच्छा से स्वीकार करते हैं। यही कारण है कि मध्यस्थता में प्राप्त समझौते अधिक टिकाऊ होते हैं और भविष्य में पुनः विवाद उत्पन्न होने की संभावना अपेक्षाकृत कम रहती है।
आज जब समाज में पारिवारिक विघटन, सामाजिक तनाव और बढ़ती मुकदमेबाजी चिंता का विषय बन चुके हैं, तब मध्यस्थता केवल न्यायिक आवश्यकता नहीं बल्कि सामाजिक आवश्यकता भी बन गई है। पति-पत्नी के बीच विवाद, भाई-भाई के बीच संपत्ति संघर्ष, पड़ोसियों के बीच मनमुटाव अथवा व्यापारिक साझेदारों के बीच मतभेद, इन सभी स्थितियों में अदालत का फैसला कानूनी समाधान तो दे सकता है, लेकिन टूटे हुए विश्वास को वापस नहीं ला सकता। मध्यस्थता का उद्देश्य उसी विश्वास को पुनर्स्थापित करना है।
दुर्ग जिले में इस अभियान के दौरान न्यायपालिका, प्रशासन, पुलिस, अधिवक्ताओं, मध्यस्थों और विधिक सेवा प्राधिकरण के बीच जो समन्वय स्थापित किया गया, वह अपने आप में उल्लेखनीय है। अभियान में जागरूकता कार्यक्रम, प्रशिक्षण सत्र, परामर्श बैठकें, प्रकरणों की स्क्रीनिंग और विभिन्न हितधारकों की सहभागिता पर विशेष बल दिया गया। इससे यह स्पष्ट संदेश गया कि विवाद समाधान केवल अदालतों का दायित्व नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
विशेष रूप से यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि अभियान में पुलिस और प्रशासन को भी सहभागी बनाया गया। सामान्यतः पुलिस को केवल कानून लागू करने वाली संस्था के रूप में देखा जाता है, लेकिन छोटे सामाजिक और पारिवारिक विवादों को प्रारंभिक स्तर पर मध्यस्थता की ओर भेजना अपराध की संभावनाओं को कम कर सकता है। इससे न केवल न्यायालयों का भार कम होगा बल्कि सामाजिक शांति भी मजबूत होगी।
हालांकि मध्यस्थता को लेकर कुछ चुनौतियां भी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी, प्रशिक्षित मध्यस्थों की सीमित उपलब्धता, लोगों की पारंपरिक मुकदमेबाजी मानसिकता तथा कुछ मामलों में समझौते को कमजोरी समझे जाने की धारणा अभी भी बाधा बनती है। इसके अतिरिक्त यह भी आवश्यक है कि मध्यस्थता प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वैच्छिक बनी रहे ताकि किसी कमजोर पक्ष पर दबाव न बने।
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि भविष्य का न्याय केवल अदालतों की चारदीवारी में सीमित नहीं रहेगा। दुनिया के अनेक देशों में मध्यस्थता और वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली न्यायिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। भारत में भी मध्यस्थता अधिनियम और न्यायपालिका की सक्रिय पहलें इसी दिशा में संकेत करती हैं। दुर्ग का यह अभियान इस व्यापक परिवर्तन का स्थानीय लेकिन प्रभावशाली उदाहरण है।
यदि देश के प्रत्येक जिले में इसी प्रकार के संगठित और परिणामोन्मुख मध्यस्थता अभियान संचालित किए जाएं, तो आने वाले वर्षों में न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। इससे न्याय अधिक सुलभ, त्वरित और मानवीय बनेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समाज में संवाद की संस्कृति मजबूत होगी, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है।
अंततः कहा जा सकता है कि 90 दिवसीय मध्यस्थता अभियान केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि न्याय की नई सोच का प्रतीक है। यह अभियान हमें याद दिलाता है कि हर विवाद को अदालत तक पहुंचना आवश्यक नहीं और हर न्याय का अंत निर्णय में ही नहीं होता। कई बार सबसे प्रभावी न्याय वह होता है जो बातचीत की मेज पर, सम्मानजनक संवाद के माध्यम से और दोनों पक्षों की सहमति से प्राप्त हो।
जब समाज संवाद को संघर्ष पर और सहमति को टकराव पर प्राथमिकता देना सीख जाएगा, तब न्याय केवल अदालतों में नहीं बल्कि लोगों के व्यवहार और संबंधों में भी दिखाई देगा। यही इस अभियान की सबसे बड़ी सफलता और सबसे महत्वपूर्ण सीख है।
आधार सामग्री: 90 दिवसीय मध्यस्थता अभियान “मीडिएशन फॉर द नेशन – समाधान और सद्भाव की यात्रा”, मध्यस्थता केंद्र, जिला न्यायालय दुर्ग, छत्तीसगढ़।
