छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: भूमि अधिग्रहण के बाद रोजगार से वंचित नहीं कर सकती एसईसीएल, 23 भू-विस्थापितों के पक्ष में आदेश

High Court of Chhattisgarh - Bilaspur

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने भूमि अधिग्रहण के बदले रोजगार के अधिकार से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) को बड़ा झटका दिया है। बिलासपुर स्थित उच्च न्यायालय ने कोरबा जिले के ग्राम पाली के 23 भू-विस्थापितों की याचिकाएं स्वीकार करते हुए उनके रोजगार दावों को खारिज करने वाले आदेशों को निरस्त कर दिया और एसईसीएल को 45 दिनों के भीतर उनके मामलों पर पुनर्विचार कर उपयुक्त रोजगार उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने 17 जून 2026 को दिए गए फैसले में कहा कि भूमि अधिग्रहण से प्रभावित लोगों के पुनर्वास और रोजगार का अधिकार केवल नीतिगत सुविधा नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन और आजीविका से जुड़े संवैधानिक अधिकारों से भी जुड़ा हुआ है। यह मामला ग्राम पाली, तहसील कटघोरा, जिला कोरबा के उन किसानों और भू-स्वामियों से संबंधित था जिनकी भूमि कुसमुंडा विस्तार परियोजना के लिए कोयला उत्खनन हेतु अधिग्रहित की गई थी।

JUSTICE N. K. CHANDRAVANSHI, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH
JUSTICE N. K. CHANDRAVANSHI, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनकी भूमि का अधिग्रहण कोल बेयरिंग एरियाज (अधिग्रहण एवं विकास) अधिनियम, 1957 के तहत किया गया था। अधिग्रहण की प्रक्रिया वर्ष 2009 में शुरू हुई और अंतिम अधिसूचना के बाद उनकी भूमि एसईसीएल परियोजना में चली गई। इसके बावजूद उन्हें छत्तीसगढ़ पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति, 2007 के अनुसार रोजगार नहीं दिया गया। इसके बजाय एसईसीएल ने कोल इंडिया पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति, 2012 लागू करते हुए यह कहकर उनके दावे अस्वीकार कर दिए कि अधिग्रहित भूमि 0.54 एकड़ की निर्धारित सीमा से कम थी।

एसईसीएल ने अदालत में तर्क दिया कि जिला पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन समिति की बैठक में कोल इंडिया नीति, 2012 को लागू करने का निर्णय लिया गया था और रोजगार केवल उन लोगों को दिया जा सकता है जिनकी अधिग्रहित भूमि निर्धारित कट-ऑफ सीमा तक पहुंचती हो। कंपनी ने यह भी कहा कि कुसमुंडा विस्तार परियोजना में पहले ही बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार दिया जा चुका है और वर्तमान में पर्याप्त रिक्तियां उपलब्ध नहीं हैं।

हालांकि, उच्च न्यायालय ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने अपने पूर्व निर्णयों, विशेषकर कु. रत्थो बाई बनाम एसईसीएल, प्यारेलाल बनाम एसईसीएल और ईश्वरीलाल साहू बनाम राज्य शासन मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य सरकार की पुनर्वास नीति को वैधानिक समर्थन प्राप्त है और भूमि अधिग्रहण से प्रभावित लोगों के मामलों में वही लागू होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोल इंडिया की आंतरिक नीति राज्य की पुनर्वास नीति को निष्प्रभावी नहीं कर सकती।

न्यायालय ने छत्तीसगढ़ पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति, 2007 के प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए कहा कि इस नीति में कहीं भी रोजगार के लिए न्यूनतम भूमि क्षेत्र की अनिवार्यता निर्धारित नहीं की गई है। इसके विपरीत, नीति उन परिवारों को प्राथमिकता देने की बात करती है जिनकी पूरी कृषि भूमि अधिग्रहित हो गई हो। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ताओं का दावा इसी श्रेणी में आता है और केवल 0.54 एकड़ से कम भूमि होने के आधार पर उन्हें अयोग्य ठहराना कानूनन टिकाऊ नहीं है।

फैसले में सर्वोच्च न्यायालय के नर्मदा बचाओ आंदोलन और एन.डी. जयाल बनाम भारत संघ मामलों का भी उल्लेख किया गया। उच्च न्यायालय ने कहा कि पुनर्वास केवल भोजन, कपड़ा या आवास तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रभावित व्यक्तियों की आजीविका को पुनर्स्थापित करना भी उसका अभिन्न हिस्सा है। अदालत ने कहा कि “भूमि विस्थापितों का पुनर्वास अनुच्छेद 21 का तार्किक परिणाम है” और उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिलना चाहिए।

महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए न्यायालय ने कहा, “भूमि खोने वालों का पुनर्वास नीति के अनुसार रोजगार पाने का अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसका मूल्यांकन भूमि अधिग्रहण की तिथि पर लागू नीति के आधार पर किया जाना चाहिए। बाद में नीति में हुआ परिवर्तन उनके अर्जित अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकता।” अदालत ने आगे कहा कि रोजगार से इनकार करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के विपरीत है।

इन निष्कर्षों के आधार पर उच्च न्यायालय ने सभी विवादित आदेशों को रद्द कर दिया और एसईसीएल को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं अथवा उनके द्वारा नामित पात्र पारिवारिक सदस्यों को उनकी शैक्षणिक योग्यता और पात्रता के अनुसार अपने किसी भी प्रतिष्ठान में उपयुक्त रोजगार देने के लिए 45 दिनों के भीतर मामलों पर पुनर्विचार करे। सभी याचिकाएं इसी सीमा तक स्वीकार कर ली गईं।