विपक्ष के नेता की नियुक्ति पर कलकत्ता हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, स्पीकर के अधिकारों पर उठाए सवाल

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कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (एलओपी) की नियुक्ति को लेकर चल रहे विवाद पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने मंगलवार को महत्वपूर्ण सवाल उठाए। न्यायमूर्ति कृष्णा राव की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान पूछा कि क्या विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) उस नाम को नजरअंदाज कर सकते हैं जिसे विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी ने प्रस्तावित किया हो और अपनी स्वतंत्र राय के आधार पर किसी अन्य विधायक को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे सकते हैं।

मामला उस याचिका से जुड़ा है जिसमें स्पीकर द्वारा बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता देने के फैसले को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष पद के लिए विधिवत नामित किया था। याचिका में मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) की नियुक्ति को भी चुनौती दी गई है।

कोर्ट ने पूछा, बहुमत के प्रस्ताव को कैसे किया नजरअंदाज?

सुनवाई के दौरान अदालत ने विधानसभा की उस समय की स्थिति पर स्पष्टीकरण मांगा जब नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति का प्रस्ताव स्पीकर को भेजा गया था। राज्य की ओर से बताया गया कि उस समय विधानसभा में दलों की संख्या में कोई बदलाव नहीं हुआ था।

इस पर अदालत ने कहा कि प्रस्ताव उस राजनीतिक दल की ओर से आया था जिसके पास विपक्षी विधायकों का सबसे बड़ा समर्थन था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस मामले में मूल प्रश्न यह है कि क्या स्पीकर बहुमत वाले विपक्षी दल द्वारा भेजे गए नाम को नजरअंदाज कर किसी अन्य व्यक्ति को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त कर सकते हैं।

राज्य सरकार ने स्पीकर के फैसले का किया बचाव

स्पीकर की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता (एएजी) ने दलील दी कि यह मामला परिस्थितियों पर निर्भर करता है और स्पीकर को राजनीतिक दल की आंतरिक संरचना तथा उपलब्ध दस्तावेजों की जांच करने का अधिकार है। उन्होंने कहा कि स्पीकर ने सुप्रीम कोर्ट के शिवसेना मामले में निर्धारित सिद्धांतों के अनुरूप ही कार्य किया।

हालांकि अदालत ने पूछा कि यदि लगभग 70 विधायकों के समर्थन वाला प्रस्ताव पहले से मौजूद था, तो स्पीकर ने उस पर सीधे कार्रवाई करने के बजाय स्वतंत्र जांच क्यों शुरू की।

प्रस्ताव की वैधता पर विवाद

राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि मामले में 6 मई और 19 मई की दो अलग-अलग प्रस्तावित संकल्प (रिजॉल्यूशन) शामिल हैं। राज्य का दावा है कि जिस दस्तावेज पर 6 मई की तारीख अंकित है, उस पर विधायकों ने वास्तव में 19 मई को हस्ताक्षर किए थे।

सरकार ने यह भी कहा कि दस्तावेज में मौजूद हस्ताक्षर ब्लॉक अक्षरों में हैं और विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में उपलब्ध हस्ताक्षरों से मेल नहीं खाते। इसी आधार पर स्पीकर ने दस्तावेजों की जांच शुरू की थी।

अदालत ने स्पीकर की प्रक्रिया पर जताई चिंता

न्यायमूर्ति राव ने पूछा कि यदि पहला प्रस्ताव पहले ही प्राप्त हो चुका था, तो बाद में उठे विवादों के आधार पर उसे कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता देने के लिए किस प्रस्ताव पर भरोसा किया गया।

राज्य ने जवाब में कहा कि शिकायत मिलने के बाद स्पीकर ने सभी संबंधित दस्तावेजों, बैठकों के रिकॉर्ड और प्रस्तावों की जांच की। इसी दौरान 58 तृणमूल कांग्रेस विधायकों के समर्थन वाला एक अन्य पत्र भी स्पीकर को प्राप्त हुआ, जिसे निर्णय लेते समय ध्यान में रखा गया।

क्या स्पीकर दो प्रस्तावों में खुद फैसला कर सकते हैं?

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या स्पीकर बिना किसी कारणयुक्त आदेश के पहले प्रस्ताव को खारिज किए बिना दो प्रतिस्पर्धी प्रस्तावों में से किसी एक को स्वीकार कर सकते हैं। न्यायालय ने पूछा कि क्या बंगाल इमोल्यूमेंट्स एक्ट, 1936 ऐसी शक्ति प्रदान करता है।

अदालत ने यह भी कहा कि केवल दो विधायकों की शिकायत के आधार पर यह समझना कठिन है कि पहले प्रस्ताव को समर्थन देने वाले विधायकों की संख्या कथित तौर पर 70 से घटकर 58 कैसे हो गई।

याचिकाकर्ताओं का पक्ष

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंद्योपाध्याय ने तर्क दिया कि स्पीकर का फैसला संविधान की दसवीं अनुसूची (एंटी-डिफेक्शन कानून) और स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के विपरीत है। उनका कहना है कि राजनीतिक दल का निर्णय सर्वोपरि होना चाहिए और केवल विधायक दल के संख्याबल के आधार पर मान्यता देना दल-बदल विरोधी कानून की भावना को कमजोर करेगा।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी दावा किया कि जिन विधायकों के समर्थन के आधार पर नेता प्रतिपक्ष को मान्यता दी गई, उन्हें पहले ही पार्टी से निष्कासित किया जा चुका था और उस निष्कासन को किसी सक्षम मंच पर चुनौती नहीं दी गई है।

आगे क्या?

याचिकाकर्ताओं ने अदालत से शीघ्र सुनवाई और अंतरिम राहत की मांग की है। उनका कहना है कि 18 जून से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र से पहले सीटों के आवंटन सहित अन्य प्रशासनिक निर्णय उनके अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं।

मामले की गंभीरता को देखते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने सुनवाई को बुधवार दोपहर 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि अदालत स्पीकर की शक्तियों, राजनीतिक दल की भूमिका और नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति से जुड़े संवैधानिक प्रश्नों पर क्या रुख अपनाती है।