नई दिल्ली। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने रेशम की साड़ियों में इस्तेमाल की गई जरी की गुणवत्ता से जुड़े दो मामलों में तमिलनाडु राज्य उपभोक्ता आयोग के आदेश को निरस्त कर दिया है। राष्ट्रीय आयोग ने मामलों को नए सिरे से विचार करने के लिए राज्य आयोग के पास वापस भेजते हुए राष्ट्रीय परीक्षण गृह (National Test House), कोलकाता की जांच रिपोर्ट पर विचार करने का निर्देश दिया है। रिपोर्ट में दोनों साड़ियों में चांदी की मात्रा निर्धारित मानकों से काफी कम पाई गई थी।
राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति ए.पी. साही और सदस्य भारत कुमार पांड्या की पीठ ने कहा कि राष्ट्रीय परीक्षण गृह की रिपोर्ट विवाद के निपटारे के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य है। राज्य आयोग को इस रिपोर्ट के साथ दोनों पक्षों की दलीलों और पहले से उपलब्ध साक्ष्यों पर भी विचार करना होगा। हालांकि, NCDRC ने स्पष्ट किया कि पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार में वह स्वयं तथ्यों का नए सिरे से मूल्यांकन नहीं करेगा।
क्या है पूरा मामला?
मामले में दो शिकायतकर्ताओं, एम.एन. रंजिनी और एम.आर. नागेंद्रन ने थिरुभुवनम सिल्क हैंडलूम वीवर्स को-ऑपरेटिव सेल सोसाइटी लिमिटेड से क्रमशः 21,661 रुपये और 15,105 रुपये में रेशम की साड़ियां खरीदी थीं। दोनों ने आरोप लगाया कि साड़ियों में इस्तेमाल की गई जरी में भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के निर्धारित मानकों के अनुसार चांदी नहीं थी।
शिकायतकर्ताओं ने सलेम स्थित परीक्षण केंद्र से जांच रिपोर्ट प्राप्त करने के बाद 9 जुलाई 2011 को सोसाइटी को कानूनी नोटिस भेजा और सेवा में कमी का आरोप लगाया।
तंजावुर जिला उपभोक्ता आयोग ने शिकायतों को स्वीकार करते हुए सोसाइटी को निर्देश दिया था कि साड़ियां वापस लेने पर उनकी खरीद कीमत लौटाई जाए। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक शिकायतकर्ता को मानसिक पीड़ा के लिए 15,000 रुपये, यात्रा खर्च के लिए 5,000 रुपये और मुकदमे के खर्च के लिए 1,500 रुपये देने का आदेश दिया गया था।
राज्य आयोग ने क्यों खारिज की शिकायतें?
सोसाइटी ने जिला आयोग के आदेशों को तमिलनाडु राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में चुनौती दी। 10 जुलाई 2014 को राज्य आयोग ने जिला आयोग के आदेशों को रद्द कर दिया।
राज्य आयोग ने कहा कि शिकायतकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि जांच के लिए भेजे गए जरी के नमूने उन्हीं साड़ियों से लिए गए थे, जिन्हें उन्होंने सोसाइटी से खरीदा था। आयोग ने यह भी माना कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 13 के तहत विशेषज्ञ साक्ष्य प्राप्त करने की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। इसी आधार पर दोनों शिकायतें खारिज कर दी गईं।
इसके बाद शिकायतकर्ताओं ने राष्ट्रीय आयोग में पुनरीक्षण याचिकाएं दायर कीं।
राष्ट्रीय परीक्षण गृह की रिपोर्ट में क्या मिला?
पुनरीक्षण की सुनवाई के दौरान NCDRC ने जिला आयोग के पास जमा साड़ियों की उपयुक्त प्रयोगशाला से जांच कराने का निर्देश दिया। शुरुआत में साड़ियों को तमिलनाडु जरी लिमिटेड भेजने का निर्देश दिया गया, लेकिन परीक्षण केंद्र के राष्ट्रीय परीक्षण एवं अंशांकन प्रयोगशाला प्रत्यायन बोर्ड (NABL) से मान्यता प्राप्त नहीं होने के कारण यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।
इसके बाद साड़ियों को राष्ट्रीय परीक्षण गृह, कोलकाता भेजा गया। दिसंबर 2020 में जारी जांच रिपोर्ट को 8 मई 2024 के पत्र के माध्यम से रिकॉर्ड पर लाया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, एक साड़ी में चांदी की मात्रा 41.82 प्रतिशत और दूसरी में 38.12 प्रतिशत पाई गई। दोनों नमूनों में सोने की मात्रा 0.46 प्रतिशत दर्ज की गई।
शिकायतकर्ताओं ने दलील दी कि चांदी की यह मात्रा निर्धारित न्यूनतम मानकों से काफी कम थी। उनके अनुसार, ग्रेड-1 की साड़ियों के लिए चांदी की न्यूनतम मात्रा 75 प्रतिशत और ग्रेड-2 की साड़ियों के लिए 60 प्रतिशत होनी चाहिए।
सोसाइटी की आपत्ति पर NCDRC की टिप्पणी
सोसाइटी ने राष्ट्रीय परीक्षण गृह की रिपोर्ट पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इस बात का प्रमाण नहीं है कि जांच के लिए भेजी गई साड़ियां वही थीं, जिन्हें शिकायतकर्ताओं ने खरीदा था।
राष्ट्रीय आयोग ने इस आपत्ति को समर्थन देने वाली प्रासंगिक सामग्री के अभाव की ओर ध्यान दिलाया। आयोग ने कहा कि साड़ियां उसके निर्देश पर जांच के लिए भेजी गई थीं और जिला आयोग की निगरानी में उसकी अभिरक्षा में रखी गई थीं।
पीठ ने यह भी गौर किया कि राज्य आयोग ने स्वतंत्र जांच रिपोर्ट प्राप्त किए बिना प्रक्रियात्मक आधार पर जिला आयोग के निष्कर्षों को पलट दिया था। बाद में राष्ट्रीय आयोग के हस्तक्षेप से प्राप्त राष्ट्रीय परीक्षण गृह की रिपोर्ट विवाद के निपटारे के लिए महत्वपूर्ण हो गई।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 13 का महत्व
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 13(1)(c) के तहत, जहां किसी वस्तु में दोष निर्धारित करने के लिए उचित प्रयोगशाला से परीक्षण या विश्लेषण आवश्यक हो, वहां संबंधित आयोग को निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है।
NCDRC ने माना कि विशेषज्ञ साक्ष्य से संबंधित निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना पहले के निष्कर्षों को खारिज करना एक महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक अनियमितता थी। हालांकि, आयोग ने स्वयं यह अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया कि सोसाइटी ने उपभोक्ताओं को दोषपूर्ण साड़ियां बेची थीं। उसने कहा कि जांच रिपोर्ट की विश्वसनीयता, नमूनों की पहचान और सोसाइटी की आपत्तियों का मूल्यांकन राज्य आयोग को करना चाहिए।
राज्य आयोग को नए सिरे से सुनवाई का निर्देश
राष्ट्रीय आयोग ने दोनों पुनरीक्षण याचिकाओं को स्वीकार करते हुए 10 जुलाई 2014 के राज्य आयोग के आदेश को निरस्त कर दिया। प्रथम अपील संख्या 437/2012 और 438/2012 को नए सिरे से विचार के लिए बहाल किया गया है।
राज्य आयोग को राष्ट्रीय परीक्षण गृह की रिपोर्ट रिकॉर्ड पर लेने, सोसाइटी को उस पर आपत्ति दाखिल करने का अवसर देने और शिकायतकर्ताओं को उन आपत्तियों का जवाब देने की अनुमति देने का निर्देश दिया गया है। आयोग ने मामलों का शीघ्र निपटारा करने को भी कहा है।
दोनों पक्षों को 15 अक्टूबर 2026 को राज्य आयोग के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है।
मामले का महत्व: यह आदेश उपभोक्ता विवादों में वस्तुओं की गुणवत्ता से संबंधित वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट और विशेषज्ञ साक्ष्य के महत्व को रेखांकित करता है। साथ ही, यह स्पष्ट करता है कि ऐसे साक्ष्यों पर विचार करते समय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।
