पुराने आपराधिक मामलों को छिपाने पर सरकारी नौकरी से बर्खास्तगी हर मामले में उचित नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

JUSTICE BIBHU DATTA GURU, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारी द्वारा पुराने आपराधिक मामलों की जानकारी सत्यापन फॉर्म में नहीं देने से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि केवल आपराधिक मामलों का खुलासा नहीं करने के आधार पर कर्मचारी की सेवा समाप्त करना हर स्थिति में उचित नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि नियोक्ता को कार्रवाई करने से पहले मामले की पूरी परिस्थितियों, आरोपी की उम्र, अपराध की प्रकृति, मुकदमे के परिणाम, बीते समय और कर्मचारी के बाद के आचरण को वस्तुनिष्ठ तरीके से देखना होगा।

यह मामला सरगुजा निवासी हीरा प्रसाद यादव से जुड़ा है, जिन्हें विज्ञापन क्रमांक 11/2014 के तहत सहायक प्राध्यापक (कॉमर्स) के पद पर चयनित किया गया था। उनकी नियुक्ति 5 अक्टूबर 2018 को हुई और उन्होंने 10 अक्टूबर 2018 को शासकीय राजमोहिनी देवी गर्ल्स पीजी कॉलेज, अंबिकापुर में कार्यभार संभाला था। बाद में चरित्र सत्यापन के दौरान उनके खिलाफ वर्ष 1994 में दर्ज दो आपराधिक मामलों की जानकारी सामने आई। विभाग ने सत्यापन फॉर्म में इन मामलों का खुलासा नहीं किए जाने को आधार बनाकर उनकी सेवा समाप्त कर दी थी।

याचिकाकर्ता के अनुसार दोनों मामले उस समय के हैं जब वह लगभग 17 वर्ष के थे और कक्षा 11वीं में पढ़ रहे थे। एक मामला अपराध क्रमांक 969/1994 में IPC की धारा 399 और 402 के तहत दर्ज हुआ था, जिसमें उन्हें 11 दिसंबर 1997 को बरी कर दिया गया। दूसरे मामले में अपराध क्रमांक 443/1994 के तहत IPC की धाराओं 324, 147, 323 और 34 में कार्रवाई हुई थी और उसमें 13 नवंबर 1995 को उन्हें बरी कर दिया गया था। इसके बाद उनके खिलाफ किसी अन्य आपराधिक मामले का उल्लेख नहीं किया गया। उन्होंने आगे उच्च शिक्षा प्राप्त की और M.Com., M.Phil. तथा Ph.D. जैसी डिग्रियां हासिल करने के बाद नियमित चयन प्रक्रिया से सहायक प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति प्राप्त की।

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि सत्यापन फॉर्म के कॉलम नंबर 12 में इन मामलों की जानकारी देना भूलवश रह गया था। बाद में उन्होंने 15 जनवरी 2021 को शपथपत्र देकर आपराधिक मामलों और बरी होने की जानकारी विभाग को दी। इसके बाद 7 सितंबर 2021 को उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसका उन्होंने जवाब भी दिया। उनका तर्क था कि विभाग ने उनकी उम्र, मामलों की पुरानापन, बरी होने के आदेश, उच्च शिक्षा, नियुक्ति के बाद के आचरण और छह वर्ष से अधिक की सेवा जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर समुचित विचार नहीं किया।
राज्य सरकार की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि याचिकाकर्ता ने केवल सत्यापन फॉर्म में ही नहीं, बल्कि वर्ष 2018 में दिए गए एक शपथपत्र में भी अपने आपराधिक मामलों का खुलासा नहीं किया था। सरकार के अनुसार बाद में दिया गया शपथपत्र पहले की गलत या अधूरी घोषणा को समाप्त नहीं कर सकता। राज्य ने यह भी कहा कि बरी होने के बावजूद जब विशेष रूप से आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी मांगी गई थी, तब उसे सही और पूरी जानकारी देना कर्मचारी का दायित्व था।

जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने 9 सितंबर 2026 को मामले की सुनवाई करते हुए माना कि आपराधिक मामलों का खुलासा नहीं किया जाना विवादित नहीं है। लेकिन अदालत के सामने वास्तविक सवाल यह था कि क्या इस चूक के आधार पर कर्मचारी को सरकारी सेवा के लिए अनुपयुक्त मानते हुए सेवा समाप्त करने जैसा कठोर कदम उठाना उचित था। अदालत ने कहा कि सरकार को चरित्र और पूर्ववृत्त की जांच करने का अधिकार है, लेकिन उस अधिकार का इस्तेमाल मनमाने या यांत्रिक तरीके से नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Avtar Singh v. Union of India में निर्धारित सिद्धांतों और Ravindra Kumar v. State of U.P., (2024) 5 SCC 264 सहित कई फैसलों का उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार आपराधिक पूर्ववृत्त का सत्यापन कर्मचारी की उपयुक्तता तय करने का महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन अंतिम निर्णय “objective criteria” और मामले के सभी प्रासंगिक पहलुओं पर विचार करने के बाद लिया जाना चाहिए। अदालत ने विशेष रूप से यह सिद्धांत रेखांकित किया कि “Suppression of ‘material’ information presupposes that what is suppressed that ‘matters’ not every technical or trivial matter.”

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी आपराधिक मामले की जानकारी छिपाने का अर्थ अपने आप सेवा से बर्खास्तगी नहीं है। Pawan Kumar v. Union of India, Ram Kumar v. State of U.P., Commissioner of Police v. Sandeep Kumar और Mohammed Imran v. State of Maharashtra जैसे मामलों में यह सिद्धांत सामने आया कि कर्मचारी की उपयुक्तता तय करते समय अपराध की प्रकृति, उम्र, मामले का परिणाम और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि वर्तमान मामले में 1994 के आपराधिक मामले उस समय दर्ज हुए थे जब याचिकाकर्ता करीब 17 वर्ष के थे। दोनों मामलों में वह बरी हो चुके थे और 2018 में सरकारी सेवा में आने तक दो दशक से अधिक समय बीत चुका था। इस अवधि में उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की और सरकारी सेवा में चयनित होने के बाद छह वर्ष से अधिक समय तक काम भी किया। अदालत के अनुसार ये सभी परिस्थितियां उनकी सेवा में बने रहने की उपयुक्तता तय करने के लिए महत्वपूर्ण थीं।

अदालत ने यह भी माना कि बाद में 15 जनवरी 2021 को दिया गया शपथपत्र पहले की गैर-घोषणा को पूरी तरह समाप्त नहीं करता। यानी बाद की जानकारी देने से पहले की घोषणा स्वतः सही नहीं हो जाती। हालांकि, बाद का खुलासा, याचिकाकर्ता की ओर से दिया गया स्पष्टीकरण, उसकी कम उम्र, दोनों मामलों में बरी होना, लंबा समय बीत जाना और उसके बाद का सेवा रिकॉर्ड ऐसे तथ्य थे, जिन पर सक्षम प्राधिकारी को अंतिम निर्णय लेने से पहले विचार करना चाहिए था।

हाईकोर्ट ने पाया कि 17 फरवरी 2025 के सेवा समाप्ति आदेश में इन सभी परिस्थितियों का समग्र और सार्थक मूल्यांकन दिखाई नहीं देता। आदेश में मुख्य रूप से गैर-घोषणा को आधार बनाकर याचिकाकर्ता को सरकारी सेवा के लिए अनुपयुक्त माना गया, जबकि उसकी उम्र, मामलों के अंतिम परिणाम, नियुक्ति से पहले बीता लंबा समय, शैक्षणिक उपलब्धियां, छह वर्ष से अधिक की सेवा और उसके स्पष्टीकरण पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया।

अदालत ने यह भी कहा कि केवल किसी अपराध को “moral turpitude” से जुड़ा बताना ही सेवा में अनुपयुक्तता का अंतिम आधार नहीं बन सकता। मामले की वास्तविक परिस्थितियों और कर्मचारी के बाद के आचरण को भी देखना होगा। अदालत के अनुसार, “The distinction between the existence of the power and the manner of its exercise assumes significance in the present case.” अर्थात नियोक्ता के पास कार्रवाई करने की शक्ति होना अलग बात है और उस शक्ति का उचित तरीके से इस्तेमाल करना अलग।

इस फैसले का व्यापक कानूनी महत्व यह है कि सरकारी सेवा में चरित्र सत्यापन के दौरान जानकारी छिपाना गंभीर विषय हो सकता है, लेकिन इसका परिणाम हर मामले में स्वतः बर्खास्तगी नहीं हो सकता। सक्षम प्राधिकारी को यह देखना होगा कि छिपाई गई जानकारी वास्तव में कर्मचारी की वर्तमान उपयुक्तता को किस हद तक प्रभावित करती है। खासकर पुराने मामलों, कम उम्र में हुई घटनाओं, बरी होने और लंबे समय तक स्वच्छ सेवा रिकॉर्ड जैसी परिस्थितियों को नजरअंदाज करके केवल तकनीकी गैर-घोषणा के आधार पर कठोर दंड देना न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं सकता। यह सिद्धांत संविधान के अनुच्छेद 226/227 के तहत न्यायिक समीक्षा की भूमिका से भी जुड़ता है, जिसके माध्यम से हाईकोर्ट प्रशासनिक निर्णय में मनमानेपन और गैर-वस्तुनिष्ठता की जांच कर सकता है।
अदालत ने अंततः उच्च शिक्षा विभाग के सचिव द्वारा 17 फरवरी 2025 को पारित सेवा समाप्ति आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को तत्काल सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया और वरिष्ठता के उद्देश्य से सेवा की निरंतरता प्रदान की। हालांकि, जिस अवधि में उन्होंने वास्तव में सेवा नहीं की, उस अवधि का बकाया वेतन देने से अदालत ने इनकार कर दिया। याचिका स्वीकार करते हुए अदालत ने कोई लागत नहीं लगाई।

इस प्रकार छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने यह संदेश स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारियों के चरित्र सत्यापन और आपराधिक पूर्ववृत्त से जुड़े मामलों में नियमों का पालन जरूरी है, लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई तथ्यों और परिस्थितियों के समग्र मूल्यांकन के बिना नहीं की जा सकती। पुराने आपराधिक मामले, विशेषकर जिनमें आरोपी कम उम्र का था और बाद में बरी हो गया, उसकी वर्तमान सेवा-उपयुक्तता पर कितना प्रभाव डालते हैं, इसका स्वतंत्र और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करना संबंधित प्राधिकारी की जिम्मेदारी है।