बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल पंजीकृत विक्रय अनुबंध (Agreement to Sell) होना किसी संपत्ति की बिक्री को स्वतः सिद्ध नहीं करता। यदि दस्तावेज के निष्पादन पर विवाद हो और उसे निष्पादित करने वाला व्यक्ति निरक्षर हो, तो दस्तावेज पर भरोसा करने वाले पक्ष को यह साबित करना होगा कि उसकी पूरी जानकारी संबंधित व्यक्ति को समझाई गई थी और उसने अपनी स्वतंत्र सहमति से उस पर अंगूठा लगाया था।
न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू और न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की खंडपीठ ने स्वतंत्र पांडे बनाम श्रीमती के. महालक्ष्मी रेड्डी (FA No. 31 of 2023, 2026:CGHC:33508-DB) में यह फैसला सुनाते हुए विशिष्ट निष्पादन (Specific Performance) की अपील खारिज कर दी। अदालत ने रायपुर की ट्रायल कोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें वादी का दीवानी वाद पहले ही निरस्त कर दिया गया था।
वादी का दावा था कि वर्ष 2015 में प्रतिवादी ने 13 लाख रुपये में अपनी संपत्ति बेचने पर सहमति दी थी। उसके अनुसार 12 लाख रुपये नकद अग्रिम दिए गए और पंजीकृत विक्रय अनुबंध किया गया। बाद में बिक्री विलेख की समय-सीमा भी बढ़ाई गई, लेकिन प्रतिवादी ने रजिस्ट्री नहीं कराई। इसके बाद उसने न्यायालय से अनुबंध का विशिष्ट निष्पादन कराने की मांग की।
दूसरी ओर प्रतिवादी ने दावा किया कि वह निरक्षर महिला है और उसने संपत्ति बेचने का कोई समझौता नहीं किया था। उसके अनुसार उसने केवल एक लाख रुपये का ऋण लिया था और सुरक्षा के तौर पर कुछ दस्तावेजों पर अंगूठा लगाया था। उसने आरोप लगाया कि वादी ने उसकी निरक्षरता का फायदा उठाकर फर्जी विक्रय अनुबंध और पावर ऑफ अटॉर्नी तैयार कर ली।
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए पाया कि वादी यह साबित नहीं कर सका कि उसके पास 12 लाख रुपये नकद देने का स्रोत था। वह उस समय छात्र था और उसकी स्वतंत्र आय भी नहीं थी। अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि विक्रय अनुबंध और सामान्य पावर ऑफ अटॉर्नी दोनों एक ही दिन एक ही संपत्ति के संबंध में तैयार किए गए थे, लेकिन दोनों दस्तावेजों में एक-दूसरे का कोई उल्लेख नहीं था। इससे पूरे लेन-देन की विश्वसनीयता पर संदेह उत्पन्न हुआ।
खंडपीठ ने कहा कि जब दस्तावेज किसी निरक्षर व्यक्ति से निष्पादित कराया जाता है, तब यह साबित करना आवश्यक होता है कि दस्तावेज की पूरी सामग्री उसे समझाई गई थी। अदालत ने कहा कि “दस्तावेज पर केवल अंगूठा लग जाना उसके वैध निष्पादन का प्रमाण नहीं माना जा सकता। यह भी सिद्ध करना होगा कि निष्पादक ने उसकी प्रकृति और प्रभाव को समझकर अपनी सहमति दी थी।”
अदालत ने विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि दीवानी मामलों में निर्णय “संभावनाओं के प्राबल्य” (Preponderance of Probabilities) के आधार पर किया जाता है। मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए प्रतिवादी का पक्ष अधिक संभावित प्रतीत हुआ। इसलिए ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं पाया गया और अपील खारिज कर दी गई।
