छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: आदिवासी भूमि विवाद में नए सिरे से जांच के आदेश, सभी राजस्व अधिकारियों के आदेश रद्द

JUSTICE AMITENDRA KISHORE PRASAD, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आदिवासी भूमि की वापसी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 170-बी के तहत किसी विवाद का फैसला केवल पुराने राजस्व रिकॉर्ड या पंजीकृत विक्रय पत्र (रजिस्टर्ड सेल डीड) की अनुपस्थिति के आधार पर नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि यह पता लगाने के लिए विस्तृत जांच आवश्यक है कि गैर-आदिवासी व्यक्ति भूमि के कब्जे में किस प्रकार आया और उसका कब्जा कानूनन वैध था या नहीं।

न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद ने राजेन्द्र एवं अन्य बनाम विमल एवं अन्य (डब्ल्यूपीसी क्रमांक 1493/2022) में 3 अगस्त 2026 को दिए गए फैसले में राजस्व मंडल, आयुक्त, कलेक्टर तथा एसडीओ के सभी आदेश निरस्त करते हुए मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए एसडीओ, सीतापुर (जिला सरगुजा) के पास वापस भेज दिया।

मामला सरगुजा जिले के बटौली स्थित 3.96 एकड़ कृषि भूमि से जुड़ा है। आदिवासी पक्ष का दावा था कि यह भूमि उनके पूर्वज पंडरा उरांव के नाम वर्ष 1939 के रिकॉर्ड में दर्ज थी। बाद में आर्थिक कारणों से परिवार के गांव छोड़ने का लाभ उठाकर गैर-आदिवासी पक्ष ने अपने नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज करा लिए। दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं का कहना था कि भूमि उन्हें किसी निजी खरीद-बिक्री से नहीं बल्कि वर्ष 1954-55 की वैधानिक बंदोबस्त प्रक्रिया के दौरान सक्षम अधिकारी द्वारा आवंटित की गई थी और इसलिए धारा 170-बी लागू नहीं होती।

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 170-बी एक कल्याणकारी प्रावधान है, जिसका उद्देश्य आदिवासी समुदाय की भूमि को अवैध हस्तांतरण से बचाना है। इसलिए सक्षम अधिकारी का दायित्व है कि वह केवल राजस्व प्रविष्टियों पर निर्भर न रहकर यह जांच करे कि भूमि का कब्जा किस आधार पर बदला, क्या कोई वैध हस्तांतरण हुआ था, क्या धोखाधड़ी हुई थी और कब्जे का कानूनी स्रोत क्या है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि “धारा 170-बी के तहत आवश्यक जांच केवल राजस्व रिकॉर्ड देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि कब्जे और स्वामित्व के पूरे कानूनी आधार की जांच करना अनिवार्य है।”

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सभी पूर्व आदेश रद्द कर एसडीओ को निर्देश दिया कि वह मूल बंदोबस्त अभिलेख, अधिकार अभिलेख, राजस्व रिकॉर्ड और दोनों पक्षों के मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्यों की विस्तृत जांच कर नया निर्णय पारित करे। अदालत ने पक्षकारों को 19 अगस्त 2026 को एसडीओ के समक्ष उपस्थित होने तथा छह माह के भीतर मामले का निस्तारण करने का निर्देश दिया। यह फैसला राज्य में आदिवासी भूमि विवादों से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे स्पष्ट हो गया है कि धारा 170-बी के मामलों में व्यापक और निष्पक्ष जांच के बिना भूमि वापसी का आदेश नहीं दिया जा सकता।