नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (National Board for Wildlife-NBWL) को निर्देश दिया है कि वे यह स्पष्ट करें कि हिमाचल प्रदेश के संबंधित क्षेत्रों में कोई वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व (Wetland Conservation Reserve) स्थित है या नहीं। इसके बाद ही अदालत यह तय करेगी कि उन क्षेत्रों में खनन गतिविधियों पर 10 किलोमीटर की प्रतिबंधात्मक सीमा लागू होगी या नहीं।
यह मामला उत्तराखंड स्थित आसान वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व के निकट हिमाचल प्रदेश में संचालित खनन गतिविधियों से जुड़ा है। विवाद इस बात को लेकर है कि क्या उत्तराखंड में अधिसूचित संरक्षित वेटलैंड के 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाले हिमाचल प्रदेश के क्षेत्रों पर भी स्वतः वही पर्यावरणीय प्रतिबंध लागू होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल भौगोलिक निकटता के आधार पर खनन पर रोक नहीं लगाई जा सकती। पहले यह तथ्यात्मक और वैधानिक रूप से निर्धारित करना आवश्यक है कि संबंधित क्षेत्र की कानूनी स्थिति क्या है और उसका संरक्षित क्षेत्र से क्या संबंध है।
हिमाचल सरकार ने मांगा था स्पष्टीकरण
मामले की पृष्ठभूमि सुप्रीम कोर्ट के उन पूर्व आदेशों से जुड़ी है जिनमें पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के आसपास खनन गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए गए थे। इन्हीं आदेशों के मद्देनजर हिमाचल प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से स्पष्टीकरण मांगा कि क्या उत्तराखंड के आसान वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व से 10 किलोमीटर की दूरी के भीतर, लेकिन हिमाचल प्रदेश की सीमा में स्थित खनन परियोजनाओं पर भी यह प्रतिबंध लागू होगा।
राज्य सरकार का कहना है कि यदि इस प्रतिबंध को बिना किसी तथ्यात्मक जांच के लागू कर दिया गया, तो उन अनेक खनन पट्टों और स्टोन क्रशर इकाइयों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा जिन्हें सक्षम प्राधिकारियों से वैधानिक स्वीकृतियां और पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त है।
अंतरराज्यीय अधिकार क्षेत्र भी बना विवाद का विषय
हिमाचल प्रदेश ने यह भी तर्क दिया है कि आसान वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व उत्तराखंड में स्थित है। ऐसे में केवल 10 किलोमीटर की परिधि में आने के आधार पर हिमाचल प्रदेश में संचालित गतिविधियों पर संरक्षित क्षेत्र से संबंधित नियम स्वतः लागू नहीं किए जा सकते।
इससे पहले हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में भी इस अंतरराज्यीय सीमा से जुड़े विवाद पर सुनवाई हो चुकी है। रिकॉर्ड से यह भी सामने आया है कि संबंधित क्षेत्र में कई खनन पट्टे और स्टोन क्रशर इकाइयां संचालित हैं।
केंद्र और NBWL करेंगे तथ्यात्मक जांच
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड को निर्देश दिया है कि वे यह जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करें कि हिमाचल प्रदेश के संबंधित क्षेत्रों में कोई वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व मौजूद है या नहीं। अदालत ने कहा कि इसी तथ्यात्मक और वैधानिक जांच के आधार पर यह तय किया जाएगा कि 10 किलोमीटर का खनन प्रतिबंध लागू किया जा सकता है या नहीं।
पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन का मामला
यह मामला केवल खनन तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, वैधानिक मंजूरियों और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के नियमन से जुड़े व्यापक कानूनी प्रश्न भी उठाता है।
भारतीय पर्यावरण न्यायशास्त्र लगातार यह मानता रहा है कि संरक्षित क्षेत्रों और उनके आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र को विशेष सुरक्षा मिलनी चाहिए। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि ऐसे प्रतिबंध लागू करने से पहले संबंधित क्षेत्र की कानूनी स्थिति, संरक्षित क्षेत्र से उसका संबंध और लागू वैधानिक प्रावधानों का परीक्षण आवश्यक है।
अदालत ने यह भी माना कि खनन गतिविधियों का प्रभाव केवल खदान की सीमा तक सीमित नहीं रहता। इससे भूमि की संरचना, जल संसाधनों, वन्यजीवों के आवास और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए पर्यावरणीय सुरक्षा और वैधानिक प्रक्रिया, दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
अब इस मामले में केंद्र सरकार और राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि हिमाचल प्रदेश में आसान वेटलैंड कंजर्वेशन रिजर्व के निकट संचालित खनन गतिविधियों पर 10 किलोमीटर का प्रतिबंध लागू होगा या नहीं।
