सुप्रीम कोर्ट पुस्तकालय में अशोक कुमार सेन के चित्र का अनावरण, सीजेआई सूर्यकांत बोले: महान व्यक्तित्व संस्थाओं की आत्मा को जीवित रखते हैं

CJI Surya Kant says in tribute to late Senior Advocate Ashoke Kumar Sen

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और प्रख्यात वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक कुमार सेन के चित्र का अनावरण किया गया। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) द्वारा आयोजित समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की स्मृतियां केवल उसके ऐतिहासिक निर्णयों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन महान व्यक्तित्वों से भी निर्मित होती हैं जिन्होंने न्यायपालिका की चेतना और मूल्यों को आकार दिया।

समारोह को संबोधित करते हुए सीजेआई ने कहा कि यह केवल पुस्तकालय की दीवार पर एक चित्र लगाने का अवसर नहीं है, बल्कि न्याय, बौद्धिक उत्कृष्टता और सार्वजनिक सेवा को समर्पित एक महान जीवन की भावना को संस्थान में स्थायी रूप से स्थापित करने का क्षण है।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि उन्हें दो वर्ष पहले अशोक कुमार सेन स्मृति व्याख्यान देने का अवसर मिला था, जहां उन्होंने उनके प्रेरणादायी जीवन पर विस्तार से चर्चा की थी। उन्होंने सेन को असाधारण विद्वान, विलक्षण अधिवक्ता और ऐसे राजनेता के रूप में याद किया, जिन्होंने कानून और शासन दोनों क्षेत्रों में समान दक्षता के साथ देश की सेवा की।

सीजेआई ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पुस्तकालय संख्या-1 की दीवारों पर लगी महान विधिवेत्ताओं की तस्वीरें केवल स्मृति चिह्न नहीं हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी हैं। उन्होंने कहा कि पुस्तकालय में अध्ययन के लिए आने वाला प्रत्येक अधिवक्ता इस चित्र को देखकर यह महसूस करेगा कि वकालत केवल व्यक्तिगत उपलब्धि का माध्यम नहीं, बल्कि गणतंत्र की सेवा का एक पवित्र दायित्व है।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के गलियारों और न्यायालय कक्षों में पहले से ही पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और महान विधिवेत्ताओं, जैसे न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना, न्यायमूर्ति बी.के. मुखर्जी तथा पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी के चित्र स्थापित हैं। अब अशोक कुमार सेन का चित्र भी उसी परंपरा का हिस्सा बनेगा। उनके अनुसार, ये चित्र केवल महान जीवनों की स्मृति नहीं हैं, बल्कि न्यायपालिका के मूल्यों के मौन संरक्षक भी हैं।

सीजेआई ने कहा कि निर्णय लिखने वाले न्यायाधीश, याचिका तैयार करने वाले युवा अधिवक्ता और वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे वादकारी सभी इन चित्रों के सामने से गुजरते हैं। ये चित्र बिना कुछ कहे यह प्रश्न अवश्य पूछते हैं कि क्या हम उस जिम्मेदारी और गरिमा के योग्य हैं, जिसे यह संस्था हमसे अपेक्षित करती है।

अशोक कुमार सेन की कानूनी प्रतिभा का उल्लेख करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि वे अदालत में प्रभावशाली बहस करने के साथ-साथ कानून निर्माण की प्रक्रिया में भी समान रूप से दक्ष थे। जहां अधिकांश अधिवक्ता अपना पूरा जीवन केवल एक संस्था को समझने में लगा देते हैं, वहीं सेन ने कानून और शासन दोनों क्षेत्रों को दिशा देने का कार्य किया।

उन्होंने सेन की अद्भुत स्मरण शक्ति का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि वे किसी भी निर्णय को अपनी विशाल निजी विधि पुस्तक-संग्रह में उसके पृष्ठ पर सटीक स्थान सहित याद कर लेते थे। यहां तक कि कई न्यायाधीश भी किसी कठिन नज़ीर की तलाश में उनकी निजी लाइब्रेरी का सहारा लेते थे।

सीजेआई ने कहा कि किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसके पदों या उसके द्वारा बनाए गए कानूनों से नहीं होती, बल्कि उससे जुड़े प्रसंग और उसकी कार्यशैली ही उसे लोगों की स्मृतियों में अमर बनाती है।

उन्होंने सेन से जुड़ा एक प्रसिद्ध प्रसंग भी साझा किया। एक बार अदालत में बहस के दौरान जब एक न्यायाधीश ने किसी वैधानिक प्रावधान की उनकी व्याख्या पर प्रश्न उठाते हुए पूछा कि उन्हें इतनी निश्चितता कैसे है, तब सेन ने बिना किसी झिझक के उत्तर दिया, “माई लॉर्ड्स, क्योंकि यह प्रावधान मैंने ही तैयार किया है।” इस उत्तर से अदालत में ठहाके गूंज उठे, लेकिन इसके पीछे उनके अद्वितीय विधिक ज्ञान की झलक भी दिखाई दी।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सेन की प्रसिद्ध “कॉरिडोर ब्रीफिंग” का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि बार के वरिष्ठ सदस्य आज भी याद करते हैं कि यदि किसी मामले की फाइल उन्हें सुनवाई से कुछ मिनट पहले भी सौंप दी जाती थी, तो वे ऐसे बहस करते थे मानो उन्होंने उस मामले की कई सप्ताह तक तैयारी की हो। उन्होंने न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा था, “मुंबई में नानी पालखीवाला थे और कोलकाता में श्री अशोक कुमार सेन।”

सीजेआई ने आशा व्यक्त की कि अशोक कुमार सेन का चित्र युवा अधिवक्ताओं को स्वयं से यह प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करेगा कि क्या उन्होंने पर्याप्त तैयारी की है, क्या वे न्यायालय और अपने प्रतिपक्ष के प्रति निष्पक्ष रहे हैं तथा क्या उन्होंने कानून का उपयोग न्याय को सरल बनाने के लिए किया है या उसे अनावश्यक रूप से जटिल बनाने के लिए।

अपने संबोधन के अंत में न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि अशोक कुमार सेन का जीवन यह सिखाता है कि संतुलन के बिना प्रतिभा अधूरी है, सेवा के बिना पद क्षणिक है और मानवीय संवेदनाओं के बिना कानून निष्प्राण हो जाता है। उन्होंने कहा कि संस्थाएं केवल ऐतिहासिक निर्णयों और महत्वपूर्ण कानूनों से ही नहीं, बल्कि तैयारी, संयम, विनम्रता, हास्यबोध और पारस्परिक सम्मान जैसी दैनिक कार्यसंस्कृति से भी मजबूत होती हैं।

समारोह का समापन करते हुए सीजेआई ने कहा, “आज की इस शाम से अशोक कुमार सेन हमारे बीच एक ऐसे मौन वरिष्ठ के रूप में सदैव उपस्थित रहेंगे, जिन्हें कभी बोलने के लिए मंच की आवश्यकता नहीं होगी, लेकिन जिनकी उपस्थिति हमेशा सुनी जाएगी।”