नीट 2026 प्रदर्शन: सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों को अंतरिम राहत दी, नाबालिगों की तत्काल रिहाई का आदेश, पुलिस कार्रवाई की जांच के लिए एसआईटी गठित करने के संकेत

Supreme Court of India

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को नीट 2026 प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ देशभर में हुए छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण अंतरिम राहत देते हुए निर्देश दिया कि जिन छात्रों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उनके खिलाफ कोई दंडात्मक या जबरन कार्रवाई न की जाए। साथ ही अदालत ने प्रदर्शन के दौरान गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए सभी नाबालिगों को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। हालांकि न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह राहत आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों पर लागू नहीं होगी।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया यह संकेत देती है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित पुलिस अत्याचार और पुलिसकर्मियों पर हुए हमलों दोनों की निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच आवश्यक है। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत लंबित याचिकाओं में दोनों पक्षों के आरोपों की अंतिम सत्यता तय करना संभव नहीं है, इसलिए स्वतंत्र तथ्यात्मक जांच कराई जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने जांच की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए सभी सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग, बॉडी-वॉर्न कैमरा फुटेज, वायरलेस संचार रिकॉर्ड, पुलिस कंट्रोल रूम (पीसीआर) लॉग तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक और दस्तावेजी साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया। इसके अलावा अदालत ने कहा कि प्रदर्शनकारियों से संबंधित डिजिटल डेटा को संरक्षित रखा जाए, लेकिन अगली सुनवाई तक उसे सार्वजनिक न किया जाए और किसी भी प्रदर्शनकारी की व्यक्तिगत जानकारी या डिजिटल डेटा प्रकाशित न किया जाए।

पीठ ने याचिकाओं में लगाए गए उन आरोपों का भी संज्ञान लिया, जिनमें कहा गया है कि प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन, रबर बुलेट, आंसू गैस, इलेक्ट्रिक बैटन और कील लगे डंडों का इस्तेमाल किया गया, जिससे कई छात्र गंभीर रूप से घायल हुए। याचिकाओं में एक छात्र की आंख की रोशनी जाने और कई अन्य छात्रों के स्थायी रूप से दिव्यांग होने का भी दावा किया गया है। मीडिया कर्मियों के साथ मारपीट और सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों की तैनाती के आरोप भी अदालत के समक्ष रखे गए।

दूसरी ओर, अदालत ने घायल पुलिसकर्मियों की ओर से रखे गए पक्ष को भी दर्ज किया, जिसमें कहा गया कि प्रदर्शन में असामाजिक तत्व घुस आए थे और उन्होंने पथराव कर ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों को घायल किया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि लगभग 250 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं और हिंसा के लिए छात्र नहीं बल्कि आपराधिक तत्व जिम्मेदार हो सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था में संविधान द्वारा संरक्षित अधिकार है। हालांकि यदि प्रदर्शन के दौरान हिंसा या अत्यधिक बल प्रयोग के आरोप लगे हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। अदालत ने यह भी कहा कि सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई, भीड़ नियंत्रण और बल प्रयोग से संबंधित मौजूदा न्यायिक सिद्धांतों की समीक्षा कर पूरे देश के लिए एक व्यापक और आधुनिक दिशा-निर्देश तैयार करने की आवश्यकता महसूस होती है।

पीठ ने संकेत दिया कि वह पूरे मामले की जांच के लिए एक स्वतंत्र विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित कर सकती है। प्रस्तावित एसआईटी का उद्देश्य घटनाक्रम की वास्तविक श्रृंखला का पता लगाना, जिम्मेदारी तय करना और यह पहचान करना होगा कि हिंसा या अत्यधिक बल प्रयोग के लिए कौन जिम्मेदार था, चाहे वह पुलिसकर्मी हों या प्रदर्शनकारी।

एसआईटी के गठन से पहले सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार, असम, पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकारों से जवाब मांगा है। संबंधित राज्यों के मुख्य सचिवों को नोटिस जारी किए गए हैं और उनके महाधिवक्ताओं तथा स्थायी अधिवक्ताओं से न्यायालय में उपस्थित होने को कहा गया है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि विवाद केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है बल्कि कई राज्यों में इसी प्रकार की घटनाएं हुई हैं। उन्होंने दावा किया कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के समय भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 के तहत कोई निषेधाज्ञा लागू नहीं थी और पुलिस ने भीड़ नियंत्रण के लिए न्यायालय द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का पालन नहीं किया। उन्होंने प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए चेहरे की पहचान तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी प्रणाली के उपयोग पर भी चिंता जताई।

वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों को झूठे मामलों में फंसाने की धमकी दी गई, महिलाओं के साथ मारपीट हुई और इलेक्ट्रिक बैटन का इस्तेमाल किया गया। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता शादन फरासत ने बिहार का मामला उठाते हुए कहा कि राज्य सरकार द्वारा मुकदमे वापस लेने का निर्णय होने के बावजूद लगभग 150 लोग, जिनमें कई नाबालिग भी शामिल हैं, अब भी हिरासत में हैं।

अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने स्वयंसेवक जुनैद मलिक की कथित अवैध हिरासत और भारी पुलिस व्यवस्था के बावजूद पत्थरों से भरे ट्रक के प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि ऐसे आरोप भी स्वतंत्र जांच की आवश्यकता को और मजबूत करते हैं।

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी स्वतंत्र जांच का समर्थन करते हुए कहा कि यदि पुलिस की ओर से अत्यधिक बल प्रयोग हुआ है तो उसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि पुलिसकर्मियों पर हुए हमलों की भी समान रूप से जांच होनी चाहिए ताकि पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सके।

यह मामला संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिकाओं से जुड़ा है, जिनमें देशभर में सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई के लिए समान दिशा-निर्देश बनाने, जंतर-मंतर प्रदर्शन में पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र जांच कराने, बीएनएसएस की धारा 163 के प्रयोग के लिए न्यायिक मानक तय करने तथा पुलिस की कथित बर्बरता से जुड़े मामलों में प्राथमिकी दर्ज कराने और डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की मांग की गई है।

अब इस मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह होगी। तब सुप्रीम कोर्ट केंद्र और संबंधित राज्यों के जवाब पर विचार करने के बाद स्वतंत्र एसआईटी के गठन सहित आगे की कार्रवाई पर निर्णय ले सकता है।