नई दिल्ली, 3 जुलाई। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के मंडी गांव स्थित एक पेपर प्लेट निर्माण फैक्ट्री में 12 बंधुआ मजदूरों को कथित रूप से बंधक बनाकर डेढ़ वर्ष तक अमानवीय परिस्थितियों में काम कराने और उनके साथ गंभीर मारपीट किए जाने की मीडिया रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लिया है। आयोग ने इस मामले को मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन का मामला मानते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, मजदूरों को प्रतिदिन आधी रात तक जबरन काम कराया जाता था। उन्हें पर्याप्त भोजन और मजदूरी नहीं दी जाती थी तथा लगातार शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता था। मामला तब सामने आया जब एक मजदूर किसी तरह फैक्ट्री से भागने में सफल हुआ और उसने तितावी थाने में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए अन्य मजदूरों को भी फैक्ट्री से मुक्त कराया।
बचाए गए मजदूरों की चिकित्सीय जांच में उनके शरीर पर चोट, गहरे घाव, फ्रैक्चर और लंबे समय तक शारीरिक हिंसा के स्पष्ट संकेत पाए गए। जांच के दौरान पुलिस को एक व्यक्ति की मृत्यु की भी जानकारी मिली है। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि इस पूरे प्रकरण में कहीं अन्य लोगों की भी मौत तो नहीं हुई।
एनएचआरसी ने कहा है कि यदि मीडिया रिपोर्ट में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन का मामला है। आयोग ने मुजफ्फरनगर के जिलाधिकारी को श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा जारी मानक संचालन प्रक्रिया तथा बंधुआ मजदूरी प्रथा (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 के प्रावधानों के अनुसार विस्तृत जांच करने के निर्देश दिए हैं।
आयोग ने यह भी निर्देश दिया है कि सभी मुक्त कराए गए मजदूरों का तत्काल ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकरण कराया जाए तथा 8 दिसंबर 2021 को जारी एनएचआरसी की सलाह (एडवाइजरी 2.0) के अनुसार उनके पुनर्वास और सामाजिक सुरक्षा से संबंधित सभी आवश्यक कदम उठाए जाएं।
रिपोर्ट के अनुसार, पीड़ित उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, राजस्थान, हरियाणा, छत्तीसगढ़, झारखंड सहित विभिन्न राज्यों के रहने वाले हैं, जबकि कुछ मजदूर नेपाल के भी बताए गए हैं। आरोप है कि इन्हें रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और अन्य सार्वजनिक स्थानों से रोजगार, नियमित वेतन, भोजन और रहने की सुविधा का झांसा देकर फैक्ट्री लाया गया था।
फैक्ट्री पहुंचने के बाद कथित रूप से मजदूरों के मोबाइल फोन और पहचान पत्र छीन लिए गए, जिससे उनका अपने परिवारों से संपर्क पूरी तरह टूट गया। आरोप यह भी है कि मजदूरों को डराने और उनके भागने से रोकने के लिए पिटबुल नस्ल के कुत्तों का इस्तेमाल किया जाता था।
अब आयोग ने राज्य सरकार से पूरे मामले में की गई कार्रवाई, दोषियों के विरुद्ध उठाए गए कदम, जांच की वर्तमान स्थिति, मृतक की परिस्थितियों तथा मुक्त कराए गए मजदूरों के पुनर्वास संबंधी विस्तृत रिपोर्ट दो सप्ताह के भीतर प्रस्तुत करने को कहा है। यह मामला बंधुआ मजदूरी, मानव तस्करी और श्रमिकों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
