आरटीआई एक्टिविस्ट को सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली अग्रिम जमानत, कोर्ट ने कहा- आरटीआई एक्टिविज्म अब ‘बिजनेस’ बनता जा रहा है

Supreme Court of India

सुप्रीम कोर्ट ने सड़क निर्माण कार्य में बाधा डालने और सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप के आरोपी एक आरटीआई कार्यकर्ता को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान अदालत ने आरटीआई के कथित दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए टिप्पणी की कि आजकल आरटीआई एक्टिविज्म एक नया “बिजनेस” बनता जा रहा है।

न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की अवकाशकालीन पीठ ने आरटीआई कार्यकर्ता राकेश कुमार बहल की याचिका खारिज कर दी। बहल ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें अग्रिम जमानत देने से इनकार किया गया था।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि किसी सरकारी सड़क निर्माण परियोजना की निगरानी करने का अधिकार याचिकाकर्ता को किस आधार पर प्राप्त है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक परियोजनाओं के क्रियान्वयन और निगरानी के लिए सरकार के पास निर्धारित तंत्र और सक्षम अधिकारी मौजूद हैं तथा ऐसे कार्यों की देखरेख संबंधित विभागों का दायित्व है।

एफआईआर के अनुसार, याचिकाकर्ता और उसके एक सहयोगी पर सड़क निर्माण कार्य को रोकने और परियोजना के निष्पादन में बाधा पहुंचाने का आरोप है। शिकायत में कहा गया है कि दोनों ने निर्माण स्थल पर मौजूद अधिकारियों और मजदूरों से विवाद किया। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता के साथ मारपीट की, जबकि सह-आरोपी ने उसे लात मारी। इसके अलावा मजदूरों के खिलाफ जातिसूचक टिप्पणियां करने का भी आरोप लगाया गया है।

घटना के बाद पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 की विभिन्न धाराओं तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले में लगाए गए आरोप गंभीर हैं और इस चरण पर हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता। अदालत ने जांच को कानून के अनुसार आगे बढ़ाने की अनुमति देते हुए अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।