जिंदल पावर की आयकर पुनर्मूल्यांकन कार्रवाई रद्द, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने आयकर विभाग की अपील खारिज की

High Court of Chhattisgarh - Bilaspur

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने जिंदल पावर लिमिटेड के आकलन वर्ष 2009-10 से जुड़े आयकर पुनर्मूल्यांकन मामले में आयकर विभाग को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने माना कि पुराने रिकॉर्ड और पहले से जांचे जा चुके तथ्यों के आधार पर दोबारा मूल्यांकन शुरू करना केवल “राय में बदलाव” (Change of Opinion) है। ऐसा आधार आयकर अधिनियम की धारा 147 के तहत पुनर्मूल्यांकन की वैध वजह नहीं बन सकता। हाई कोर्ट ने आयकर अपीलीय अधिकरण, रायपुर के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें जिंदल पावर के खिलाफ पुनर्मूल्यांकन आदेश को निरस्त किया गया था।

यह फैसला 24 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति पार्थ प्रीतम साहू और न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने सुनाया। मामला TAXC No. 15 of 2025, Joint Commissioner of Income Tax, Range-1, Bilaspur बनाम M/s Jindal Power Limited से संबंधित था। आयकर विभाग ने आयकर अधिनियम की धारा 260A के तहत हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।

2009-10 के आयकर आकलन से शुरू हुआ विवाद

जिंदल पावर ने आकलन वर्ष 2009-10 के लिए करीब 95.29 करोड़ रुपये की आय घोषित की थी। कंपनी का मामला नियमित जांच के लिए चुना गया और आयकर अधिकारी ने धारा 143(2) के तहत नोटिस जारी किया। इसके बाद कंपनी ने मांगी गई जानकारी और दस्तावेज उपलब्ध कराए। मूल आकलन 28 दिसंबर 2011 को पूरा किया गया था।

बाद में आयकर विभाग ने माना कि कुछ मदों में कटौती और मूल्यह्रास का लाभ गलत तरीके से दिया गया है। इसके आधार पर आयकर अधिनियम की धारा 147 के तहत आकलन को दोबारा खोलने की कार्रवाई शुरू की गई। पुनर्मूल्यांकन के बाद 13 फरवरी 2015 को कर योग्य आय को बढ़ाकर करीब 238.90 करोड़ रुपये किया गया और लगभग 193.13 करोड़ रुपये की मांग निर्धारित की गई।

आयकर विभाग ने किन मुद्दों पर पुनर्मूल्यांकन किया

विभाग की ओर से मुख्य रूप से बांध पर 100 प्रतिशत मूल्यह्रास का दावा, आयकर अधिनियम की धारा 14A के तहत खर्च की अस्वीकृति, अतिरिक्त मूल्यह्रास और उत्पादन शुरू होने से पहले प्राप्त ब्याज एवं अन्य आय को लेकर आपत्ति उठाई गई थी।

विभाग का कहना था कि बांध पर करीब 8.50 करोड़ रुपये का मूल्यह्रास स्वीकार किया गया था, जबकि संबंधित मूल्यह्रास दर अनुसूची में इसका प्रावधान नहीं था। इसके अलावा करीब 11.53 करोड़ रुपये की धारा 14A के तहत अस्वीकृति, लगभग 377.81 करोड़ रुपये के अतिरिक्त मूल्यह्रास और उत्पादन-पूर्व अवधि की करीब 3.47 करोड़ रुपये की ब्याज एवं अन्य आय को भी विभाग ने पुनर्मूल्यांकन का आधार बनाया।

आयकर विभाग ने हाई कोर्ट में तर्क दिया कि यदि बाद में यह पता चलता है कि कर योग्य आय का कोई हिस्सा आकलन से छूट गया है, तो केवल इस आधार पर पुनर्मूल्यांकन को “राय में बदलाव” नहीं कहा जा सकता। विभाग ने यह भी कहा कि मूल आकलन रिकॉर्ड से मिली जानकारी भी कुछ परिस्थितियों में पुनर्मूल्यांकन की कार्रवाई का आधार बन सकती है।

जिंदल पावर ने कहा, सभी तथ्य पहले ही बताए गए थे

जिंदल पावर की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा गया कि मूल जांच के दौरान आयकर अधिकारी ने इन्हीं मुद्दों पर कंपनी से जानकारी मांगी थी। कंपनी ने बांध पर 100 प्रतिशत मूल्यह्रास, अतिरिक्त मूल्यह्रास, धारा 14A और उत्पादन-पूर्व अवधि की आय से संबंधित दस्तावेज एवं जवाब उपलब्ध कराए थे।

कंपनी का कहना था कि मूल आकलन अधिकारी ने उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद ही आकलन पूरा किया था। इसलिए बाद में उसी सामग्री के आधार पर नए अधिकारी द्वारा अलग निष्कर्ष निकालना पुनर्मूल्यांकन नहीं बल्कि पहले लिए गए निर्णय की समीक्षा करने जैसा है।

हाई कोर्ट ने धारा 147 की शर्तों को समझाया

हाई कोर्ट ने आयकर अधिनियम की धारा 147 का विश्लेषण करते हुए कहा कि किसी आकलन को दोबारा खोलने के लिए आयकर अधिकारी के पास यह मानने का उचित आधार होना चाहिए कि कर योग्य आय आकलन से छूट गई है। साथ ही, जहां कानून में निर्धारित अवधि से आगे पुनर्मूल्यांकन किया जा रहा हो, वहां करदाता द्वारा आवश्यक तथ्यों का पूर्ण और सही खुलासा नहीं किए जाने की वैधानिक शर्त भी महत्वपूर्ण है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि “Reason to Believe” केवल अधिकारी की व्यक्तिगत या मनमानी संतुष्टि नहीं हो सकती। इसके पीछे प्रासंगिक और ठोस सामग्री होनी चाहिए तथा उस सामग्री और आय के कथित रूप से छूट जाने के बीच तार्किक संबंध होना चाहिए।

पहले से जांचे गए रिकॉर्ड पर दोबारा कार्रवाई नहीं

हाई कोर्ट ने पाया कि मूल आकलन के दौरान ही आयकर अधिकारी ने जिंदल पावर से संबंधित मुद्दों पर विशेष जानकारी मांगी थी। कंपनी ने इन प्रश्नों के जवाब दिए थे और उसके बाद मूल अधिकारी ने धारा 143(3) के तहत जांच पूरी की थी। कोर्ट के अनुसार, इससे स्पष्ट होता है कि मूल अधिकारी ने संबंधित दावों और कटौतियों पर अपना विचार लागू किया था।

कोर्ट ने यह भी पाया कि पुनर्मूल्यांकन के लिए दर्ज किए गए कारण उन्हीं दस्तावेजों और सूचनाओं पर आधारित थे, जो मूल आकलन के समय रिकॉर्ड में मौजूद थे। बाद में कोई नया ठोस तथ्य या ऐसी नई सामग्री सामने आने का उल्लेख नहीं था, जिससे यह साबित हो कि आय वास्तव में बाद में प्राप्त नई जानकारी के कारण छूटी थी।

“राय में बदलाव” के आधार पर पुनर्मूल्यांकन मान्य नहीं

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी नए अधिकारी का पुराने अधिकारी से अलग मत होना अपने आप में पुनर्मूल्यांकन का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि मूल आकलन के दौरान उपलब्ध सामग्री की जांच के बाद यदि अधिकारी ने एक निष्कर्ष निकाला था, तो बाद में उसी सामग्री को देखकर अलग निष्कर्ष निकालना “Change of Opinion” के दायरे में आएगा।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “Proceedings for reassessment cannot be initiated merely because income liable to tax has escaped assessment due to mistake committed by the Assessment Officer.” यानी केवल इस वजह से पुनर्मूल्यांकन शुरू नहीं किया जा सकता कि बाद में यह राय बनी कि मूल आकलन अधिकारी से कर योग्य आय की गणना में गलती हुई थी।

आयकर विभाग की अपील खारिज

अंततः हाई कोर्ट ने माना कि पुनर्मूल्यांकन शुरू करने के लिए दर्ज किए गए “Reasons to Believe” पर्याप्त और वैध नहीं थे। कोर्ट के अनुसार, आयकर अधिकारी ने यह भी दर्ज नहीं किया था कि करदाता ने मूल आकलन के दौरान आवश्यक तथ्यों को पूरी तरह और सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया था या कोई नई महत्वपूर्ण सामग्री बाद में सामने आई थी।

इस आधार पर कोर्ट ने धारा 147 के तहत शुरू की गई पुनर्मूल्यांकन कार्यवाही को अधिकार क्षेत्र के बिना और अवैध माना। हाई कोर्ट ने आयकर अपीलीय अधिकरण द्वारा पुनर्मूल्यांकन आदेश को रद्द किए जाने के फैसले को सही ठहराते हुए आयकर विभाग की अपील खारिज कर दी। मामले में लागत के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया।

यह फैसला करदाताओं के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि आयकर विभाग को पुनर्मूल्यांकन की शक्ति जरूर प्राप्त है, लेकिन इसका इस्तेमाल पुराने आकलन की सामान्य समीक्षा के लिए नहीं किया जा सकता। यदि कोई नया और ठोस तथ्य सामने आता है या कानून में निर्धारित अन्य आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं, तभी पुनर्मूल्यांकन की कार्रवाई वैध रूप से आगे बढ़ सकती है।