छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का अहम फैसला: मामूली दंड से पहले भी कर्मचारी को सुनवाई का अवसर देना जरूरी

JUSTICE BIBHU DATTA GURU, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के विभागीय अनुशासनात्मक मामलों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को महत्वपूर्ण बताते हुए एक कर्मचारी पर लगाए गए मामूली दंड को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी पर छोटी सजा भी लगाने से पहले उसे प्रस्तावित कार्रवाई और आरोपों की जानकारी लिखित रूप से देना तथा अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना जरूरी है। यह प्रक्रिया केवल औपचारिकता नहीं बल्कि नियमों के तहत अनिवार्य सुरक्षा है।

यह आदेश जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की एकल पीठ ने प्रभवती पटेल बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य, WPS No. 6103/2026 में 23 सितंबर 2026 को पारित किया। याचिकाकर्ता प्रभवती पटेल ग्रामीण यांत्रिकी सेवा, कोरबा में सहायक ड्राफ्ट्समैन के पद पर कार्यरत थीं। उन्होंने 11 जून 2026 को जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके माध्यम से उनका एक वार्षिक वेतनवृद्धि बिना संचयी प्रभाव के रोक दी गई थी।

याचिकाकर्ता का कहना था कि उनके खिलाफ कार्रवाई करने से पहले उन्हें न तो कोई लिखित नोटिस दिया गया और न ही आरोपों पर अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का अवसर मिला। उनके अनुसार, मामला कुछ निर्माण कार्यों की प्रगति को लेकर हुई समीक्षा बैठक में प्रस्तुत जानकारी से संबंधित था। यह समीक्षा बैठक 10 जून 2026 को हुई थी और इसके अगले ही दिन 11 जून को दंड का आदेश जारी कर दिया गया।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि जानकारी संबंधित फील्ड अधिकारियों से प्राप्त सामग्री के आधार पर तैयार कर अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत की गई थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के O.K. Bhardwaj v. Union of India मामले का भी हवाला देते हुए कहा कि मामूली दंड के मामलों में भी कर्मचारी को आरोपों का जवाब देने का अवसर देना आवश्यक है।

वहीं राज्य सरकार और संबंधित अधिकारी की ओर से दलील दी गई कि प्रस्तुत की गई जानकारी सही नहीं थी और इसकी जिम्मेदारी याचिकाकर्ता की थी। इसे सरकारी कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही मानते हुए मामूली दंड लगाया गया था। यह भी कहा गया कि दंड आदेश के बाद याचिकाकर्ता ने अभ्यावेदन दिया था, जिस पर सक्षम अधिकारी ने विचार किया।

हाई कोर्ट ने मामले में छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 के नियम 16(1)(a) को महत्वपूर्ण माना। इस प्रावधान के अनुसार, किसी मामूली दंड को लगाने से पहले कर्मचारी को प्रस्तावित कार्रवाई और कथित कदाचार की जानकारी लिखित रूप से दी जानी चाहिए तथा उसे अपना पक्ष रखने के लिए उचित अवसर दिया जाना चाहिए।

कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “Rule 16(1)(a) में दी गई सुरक्षा केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है।” कोर्ट के अनुसार, कर्मचारी को आरोपों का प्रभावी ढंग से जवाब देने और अपना स्पष्टीकरण अनुशासनात्मक अधिकारी के सामने रखने का वास्तविक अवसर मिलना चाहिए।

कोर्ट ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं था कि दंड लगाने से पहले याचिकाकर्ता को प्रस्तावित कार्रवाई और आरोपों के संबंध में लिखित सूचना दी गई थी। विशेष रूप से कोर्ट ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि 10 जून की समीक्षा बैठक के बाद अगले ही दिन दंड आदेश जारी कर दिया गया। याचिकाकर्ता ने अपना अभ्यावेदन 15 जून को दिया, यानी दंड आदेश पारित होने के बाद।

हाई कोर्ट ने कहा कि दंड लगाए जाने के बाद दिया गया अभ्यावेदन नियम 16(1)(a) की उस अनिवार्य आवश्यकता को पूरा नहीं कर सकता, जिसके तहत कर्मचारी को दंड लगाने से पहले अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दंड मामूली होने के कारण इस प्रक्रिया को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

मामले में आरोपों के तथ्यात्मक आधार को लेकर भी विवाद था। याचिकाकर्ता का कहना था कि जानकारी फील्ड अधिकारियों से प्राप्त सामग्री के आधार पर प्रस्तुत की गई थी, जबकि अधिकारियों ने जानकारी की शुद्धता की जिम्मेदारी याचिकाकर्ता पर डाली। कोर्ट ने माना कि ऐसे विवादित तथ्यों पर निर्णय लेने से पहले कर्मचारी को अपना पक्ष स्पष्ट करने का प्रभावी अवसर दिया जाना आवश्यक था।

इन परिस्थितियों में हाई कोर्ट ने 11 जून 2026 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत याचिकाकर्ता की एक वार्षिक वेतनवृद्धि बिना संचयी प्रभाव के रोकी गई थी। हालांकि कोर्ट ने संबंधित सक्षम प्राधिकारी को कानून के अनुसार नए सिरे से कार्रवाई करने की स्वतंत्रता दी है, बशर्ते ऐसी कार्रवाई कानूनी रूप से अनुमत हो और छत्तीसगढ़ सिविल सेवा नियमों में निर्धारित प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किया जाए।

इस फैसले का महत्व सरकारी कर्मचारियों के विभागीय मामलों में है। कोर्ट ने दोहराया है कि मामूली दंड होने पर भी कर्मचारी को आरोपों की जानकारी और जवाब देने का अवसर देना जरूरी है। इससे विभागीय अधिकारियों के लिए यह स्पष्ट संदेश जाता है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई करते समय केवल आरोप सही होने का दावा पर्याप्त नहीं है, बल्कि निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी पालन करना होगा।