बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना में मृत्यु से जुड़े एक मुआवजा मामले में बीमा कंपनी की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए मुआवजे की राशि 67.03 लाख रुपये से घटाकर 62,14,065 रुपये कर दी है। कोर्ट ने माना कि मृतक की आय की गणना करते समय संबंधित वित्तीय वर्ष के आयकर स्लैब के अनुसार वैधानिक आयकर कटौती की जानी चाहिए थी।
मामला वर्ष 2017 में हुई सड़क दुर्घटना से संबंधित है, जिसमें 59 वर्षीय विनोद कुमार तिवारी की मृत्यु हो गई थी। दुर्घटना 13 जुलाई 2017 को हुई थी और उपचार के दौरान 22 जुलाई 2017 को उनकी मृत्यु हुई। रायपुर के 7वें अतिरिक्त मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने 28 अक्टूबर 2022 को परिजनों के पक्ष में 67,03,977 रुपये का मुआवजा निर्धारित किया था और इसकी जिम्मेदारी द न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी पर डाली थी।
बीमा कंपनी की ओर से हाईकोर्ट में मुख्य रूप से दो आपत्तियां उठाई गईं। कंपनी ने दावा किया कि दुर्घटना में शामिल वाहन को बाद में गलत तरीके से मामले में फंसाया गया। कंपनी ने यह भी बताया कि दुर्घटना के 18 दिन बाद 31 जुलाई 2017 को FIR दर्ज हुई, जबकि प्रत्यक्षदर्शी ऑटो चालक राजेश कुमार दुबे का बयान धारा 161 CrPC के तहत करीब तीन महीने बाद 13 अक्टूबर 2017 को दर्ज किया गया। वाहन की जब्ती भी 25 नवंबर 2017 को हुई थी।
हाईकोर्ट ने वाहन को झूठा फंसाए जाने की दलील को स्वीकार नहीं किया। न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल ने पाया कि प्रत्यक्षदर्शी राजेश कुमार दुबे ने स्पष्ट रूप से दुर्घटना के लिए संबंधित वाहन को जिम्मेदार बताया था। उनका बयान पुलिस की अंतिम रिपोर्ट में भी शामिल था और उनके साक्ष्य को खारिज करने का कोई ठोस आधार सामने नहीं आया। कोर्ट ने यह भी माना कि पुलिस द्वारा दाखिल चार्जशीट संबंधित वाहन के खिलाफ थी और मृतक के उपचार से जुड़े दस्तावेज भी रिकॉर्ड पर मौजूद थे।
हाईकोर्ट ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के Geeta Dubey v. United India Insurance Co. Ltd. तथा Bimla Devi v. Himachal Road Transport Corporation के फैसलों का उल्लेख किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मोटर दुर्घटना दावा मामलों में दुर्घटना को आपराधिक मुकदमे की तरह संदेह से परे साबित करना जरूरी नहीं है। ऐसे मामलों में “beyond reasonable doubt” के बजाय संभावनाओं की प्रबलता यानी preponderance of probability का मानक लागू होता है।
मुआवजे की गणना के संबंध में हाईकोर्ट ने पाया कि मृतक का मासिक वेतन 85,735 रुपये और वार्षिक आय 10,28,820 रुपये थी। सुप्रीम कोर्ट के National Insurance Company Ltd. v. Pranay Sethi के सिद्धांत के अनुसार 15 प्रतिशत भविष्य की संभावनाओं को जोड़ने के बाद वार्षिक आय 11,83,143 रुपये निर्धारित की गई।
हालांकि, अधिकरण ने आयकर के रूप में केवल 10 प्रतिशत राशि काटी थी। हाईकोर्ट ने कहा कि आयकर की कटौती संबंधित वित्तीय वर्ष 2017-18 के लागू टैक्स स्लैब के अनुसार होनी चाहिए। कोर्ट ने कुल आयकर और शिक्षा उपकर 1,72,466 रुपये निर्धारित किया। इसके बाद मृतक की वार्षिक आय 10,10,677 रुपये मानी गई।
इसके आधार पर व्यक्तिगत खर्च के लिए एक-तिहाई राशि घटाने और 9 के मल्टीप्लायर को लागू करने के बाद मुआवजे की पुनर्गणना की गई। हाईकोर्ट ने अंतिम रूप से 62,14,065 रुपये का मुआवजा निर्धारित किया, जबकि अधिकरण ने 67,03,977 रुपये दिए थे। कोर्ट ने बाकी शर्तों को यथावत रखते हुए बीमा कंपनी की अपील को इस सीमा तक आंशिक रूप से मंजूर कर लिया।
यह फैसला मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में आय की सही गणना और आयकर कटौती के महत्व को रेखांकित करता है। साथ ही, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि केवल FIR में देरी या प्रत्यक्षदर्शी का बयान देर से दर्ज होने के आधार पर दुर्घटना में शामिल वाहन को झूठा फंसाया गया नहीं माना जा सकता, यदि उपलब्ध साक्ष्य और पुलिस जांच दावे का समर्थन करते हों।
