छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: समझौता नहीं तो लोक अदालत विवादित मामले का फैसला नहीं कर सकती

JUSTICE RAVINDRA KUMAR AGRAWAL, JUDGE HIGH COURT OF CHHATTISGARH

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लोक अदालत की अधिकारिता को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी मामले में समझौता या आपसी सहमति नहीं होने पर लोक अदालत विवादित दावे का गुण-दोष के आधार पर फैसला नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि लोक अदालत का अधिकार क्षेत्र पक्षकारों के बीच समझौता या सेटलमेंट कराने तक सीमित है। यदि समझौता नहीं होता है तो मामला संबंधित सक्षम न्यायालय या प्राधिकारी को वापस भेजना आवश्यक है।

जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने यह आदेश CSPDCL से जुड़े मुआवजा मामले में पारित किया। मामला वर्ष 2015 में दायर WP227 No. 547 of 2015 से संबंधित था और आदेश 15 सितंबर 2026 को सुनाया गया।

मामले में मृतक छोटू उर्फ शत्रुहन पटेल की मृत्यु रोजगार के दौरान हुई थी। उसके माता-पिता मीना बाई पटेल और चमूरू पटेल ने तत्कालीन Workmen’s Compensation Act, 1923 की धारा 22 के तहत 9,00,880 रुपये मुआवजे की मांग करते हुए दावा प्रस्तुत किया था। मृतक के बारे में कहा गया था कि वह CSPDCL द्वारा लगाए गए एक ठेकेदार के अधीन कार्य कर रहा था।

दावे की कार्यवाही के दौरान छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) ने अपनी देनदारी से इनकार किया, लेकिन 10 मार्च 2014 को 9,00,880 रुपये की राशि आयुक्त के समक्ष अस्थायी रूप से और आपत्ति के साथ जमा कर दी। कंपनी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि यह राशि उसकी देनदारी स्वीकार करने के तौर पर जमा नहीं की गई है और इसे ठेकेदार से वसूल किया जाना चाहिए।

इसके बाद CSPDCL की ओर से पेश अधिवक्ता की अनुपस्थिति के कारण कंपनी को 11 नवंबर 2014 को एकतरफा कर दिया गया। बाद में दावेदारों ने यह कहते हुए अपना दावा गुण-दोष के आधार पर आगे नहीं बढ़ाने की बात कही कि मुआवजे की राशि पहले ही जमा हो चुकी है। मामला 6 दिसंबर 2014 को नेशनल लोक अदालत के समक्ष पहुंचा।

नेशनल लोक अदालत ने 6 दिसंबर 2014 को जमा राशि मृतक के कानूनी उत्तराधिकारियों और आश्रितों को देने का निर्देश दिया। साथ ही उसने संबंधित ठेकेदार को मुआवजा देने की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया। यही आदेश बाद में विवाद का मुख्य कारण बना, क्योंकि पक्षकारों के बीच ऐसा कोई समझौता हुआ ही नहीं था।

CSPDCL ने हाईकोर्ट में दलील दी कि राशि केवल प्रोटेस्ट के तहत जमा की गई थी और कंपनी ने कभी अपनी देनदारी स्वीकार नहीं की थी। दूसरी ओर ठेकेदार ने मृतक के साथ नियोक्ता-कर्मचारी संबंध होने से ही इनकार किया था। ऐसे में ठेकेदार की देनदारी का प्रश्न स्वयं विवादित था और लोक अदालत को इस मुद्दे पर निर्णय देने का अधिकार नहीं था।

हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि पक्षकारों के बीच न तो कोई साझा प्रस्ताव था, न आपसी स्वीकृति और न ही कोई अंतिम समझौता। कोर्ट ने कहा कि CSPDCL द्वारा आपत्ति के साथ जमा की गई राशि को समझौते की सहमति या ठेकेदार की देनदारी से संबंधित किसी स्वीकारोक्ति के रूप में नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “लोक अदालत के समक्ष कोई समझौता नहीं होने पर विवादित दावे का गुण-दोष के आधार पर निर्णय नहीं किया जा सकता।” हाईकोर्ट ने माना कि लोक अदालत ने एक ओर दावेदारों के दावे को आगे नहीं बढ़ाने की बात दर्ज की और दूसरी ओर ठेकेदार को देनदारी से मुक्त कर दिया। यह प्रक्रिया कानूनन उचित नहीं थी।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के State of Punjab v. Jalour Singh और B.P. Moideen Sevamandir v. A.M. Kutty Hassan जैसे फैसलों का भी उल्लेख किया। इन फैसलों में स्पष्ट किया गया है कि लोक अदालत का काम समझौता या सेटलमेंट कराना है। यदि समझौता नहीं होता है तो मामला उस न्यायालय या प्राधिकारी को वापस भेजा जाना चाहिए, जहां से उसे लोक अदालत में भेजा गया था।

कोर्ट ने Legal Services Authorities Act, 1987 की धारा 19 और 20 के प्रावधानों पर भी भरोसा किया। इन प्रावधानों के अनुसार लोक अदालत समझौते या सेटलमेंट के आधार पर मामले का निपटारा कर सकती है। समझौता नहीं होने पर मामले को वापस संबंधित न्यायालय के पास भेजना होता है।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि CSPDCL को मामले में अपना पक्ष रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए था। कंपनी ने 19 दिसंबर 2014 को एकतरफा आदेश और लोक अदालत के अवार्ड को हटाने के लिए आवेदन किया था। कोर्ट ने उसकी ओर से दी गई अनुपस्थिति की वजह को परिस्थितियों में उचित माना और कहा कि कंपनी ने अत्यधिक देरी से राहत की मांग नहीं की थी।

इसके बाद हाईकोर्ट ने 11 नवंबर 2014 का एकतरफा आदेश, 15 जून 2015 का श्रम न्यायालय का आदेश और 6 दिसंबर 2014 का नेशनल लोक अदालत का अवार्ड रद्द और निरस्त कर दिया। मामले को कर्मचारी मुआवजा आयुक्त, श्रम न्यायालय, बिलासपुर के पास नए सिरे से गुण-दोष के आधार पर सुनवाई के लिए भेज दिया गया। सभी पक्षों को सुनवाई का पर्याप्त अवसर देने का निर्देश दिया गया है। पहले से जमा मुआवजे की राशि का अंतिम निर्धारण नए फैसले के परिणाम के अधीन रहेगा।

इस फैसले का महत्व इसलिए भी है क्योंकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि लोक अदालत को नियमित न्यायालय की तरह विवादित अधिकारों और देनदारियों का फैसला करने की शक्ति नहीं है। लोक अदालत की प्रक्रिया का आधार सहमति और समझौता है। यदि पक्षकारों के बीच विवाद कायम है, तो उसका फैसला सक्षम न्यायिक या वैधानिक प्राधिकारी द्वारा कानून के अनुसार किया जाना चाहिए।

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