सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: रिटायरमेंट से एक दिन पहले झारखंड DGP की नियुक्ति नियमों के खिलाफ

Supreme Court of India

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि तदाशा मिश्रा को झारखंड का पुलिस महानिदेशक (DGP) नियुक्त किया जाना अदालत द्वारा निर्धारित उन सिद्धांतों का उल्लंघन था, जिनके अनुसार DGP पद पर नियुक्ति के समय अधिकारी की कम से कम छह महीने की सेवा शेष होनी चाहिए।

1994 बैच की IPS अधिकारी तदाशा मिश्रा को हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली झारखंड सरकार ने पिछले वर्ष दिसंबर में DGP नियुक्त किया था। उनकी नियुक्ति निर्धारित सेवानिवृत्ति से महज एक दिन पहले की गई थी।

यह टिप्पणी राज्यों में DGP की नियुक्ति से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई। वरिष्ठ अधिवक्ता और न्यायमित्र (Amicus Curiae) राजू रामचंद्रन ने सुप्रीम कोर्ट के 18 अगस्त के आदेश के बाद इस संबंध में एक नोट अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया है।

मामला झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने राज्य में DGP की नियुक्ति के लिए बनाए गए संशोधित नियमों को चुनौती दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी अधिकारी को उसकी सेवानिवृत्ति से महज एक दिन पहले DGP नियुक्त करना प्रकाश सिंह मामले में दिए गए सिद्धांतों का स्पष्ट और पूर्ण उल्लंघन है। अदालत ने पुलिस प्रमुख की नियुक्ति से संबंधित अपने पूर्व के निर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि इनका उद्देश्य DGP को पर्याप्त कार्यकाल उपलब्ध कराना और पुलिस प्रशासन में स्थिरता सुनिश्चित करना है।

साल 2006 में प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि राज्य का DGP उन तीन सबसे वरिष्ठ अधिकारियों में से चुना जाना चाहिए, जिन्हें UPSC द्वारा पैनल में शामिल किया गया हो। चयन अधिकारी के सेवा रिकॉर्ड, अनुभव और राज्य पुलिस बल का नेतृत्व करने की उपयुक्तता के आधार पर किया जाना था।

सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों का उद्देश्य DGP की नियुक्ति प्रक्रिया को पारदर्शी और संस्थागत बनाना तथा पुलिस प्रमुख को पर्याप्त कार्यकाल सुनिश्चित करना था। झारखंड में हुई नियुक्ति ने अब राज्यों द्वारा DGP की नियुक्ति और सेवा अवधि से संबंधित नियमों के पालन पर फिर से न्यायिक और प्रशासनिक बहस को केंद्र में ला दिया है।