सीजेआई सूर्यकांत ने भारत-जर्मनी के बीच वाणिज्यिक मध्यस्थता सहयोग मजबूत करने पर दिया जोर

India-Germany Partnership on Commercial Arbitration

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने भारत और जर्मनी के बीच वाणिज्यिक मध्यस्थता के क्षेत्र में दीर्घकालिक और संस्थागत सहयोग मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच बढ़ते कारोबारी संबंधों के साथ सीमा-पार व्यावसायिक विवादों के प्रभावी और भरोसेमंद समाधान के लिए मजबूत मध्यस्थता व्यवस्था जरूरी है।

बर्लिन में आयोजित इंडो-जर्मन आर्बिट्रेशन कॉन्क्लेव के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि आर्थिक गतिविधियों और व्यावसायिक साझेदारियों के विस्तार के साथ विवाद होना स्वाभाविक है। किसी परिपक्व कानूनी व्यवस्था की वास्तविक कसौटी यह है कि वह ऐसे विवादों का समाधान कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से करती है, ताकि विवाद के कारण मूल कारोबारी संबंध पूरी तरह प्रभावित न हों।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि मध्यस्थता को केवल किसी अनुबंध में शामिल एक प्रक्रियात्मक व्यवस्था के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पीछे व्यावसायिक पक्षों की तटस्थता, लचीलेपन और कानूनी निश्चितता के प्रति एक स्पष्ट प्रतिबद्धता होती है।

अपने संबोधन की शुरुआत “Good morning, and Guten Morgen” से करते हुए सीजेआई ने भारत और जर्मनी के बीच सटीकता के प्रति साझा सम्मान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जर्मनी की पहचान उसकी निर्माण क्षमता, बौद्धिक परंपरा और तकनीकी दक्षता से जुड़ी है, जबकि भारत ने गणित, खगोल विज्ञान और वास्तुकला जैसे क्षेत्रों में ऐतिहासिक रूप से अपनी उत्कृष्टता साबित की है।

उन्होंने कहा कि जब दो ऐसे देश, जो अपने-अपने तरीके से सटीकता को महत्व देते हैं, मिलकर विवाद समाधान की व्यवस्था तैयार करते हैं तो उससे एक टिकाऊ प्रणाली विकसित होने की संभावना बढ़ जाती है।

सीजेआई ने भारत-जर्मनी के बढ़ते आर्थिक संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि जर्मनी का भारत में निवेश और भारतीय कंपनियों की जर्मनी में बढ़ती मौजूदगी ने दोनों देशों के बीच कारोबारी समझौतों को पहले की तुलना में अधिक जटिल बना दिया है। आपूर्ति श्रृंखला, बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, तकनीकी सहयोग और संयुक्त उपक्रमों से जुड़े अनुबंधों में विवाद की स्थिति में प्रभावी समाधान व्यवस्था की आवश्यकता और बढ़ जाती है।

भारत में मध्यस्थता कानूनों में हुए सुधारों का उल्लेख करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 में 2015, 2019 और 2021 में किए गए संशोधनों का उद्देश्य अनावश्यक न्यायिक हस्तक्षेप को कम करना, प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना और संस्थागत मध्यस्थता को प्रोत्साहित करना रहा है।

उन्होंने कहा कि भारतीय अदालतों ने समय के साथ पक्षकारों की स्वायत्तता के सिद्धांत को मजबूत किया है और जहां आवश्यक हो, वहीं सीमित न्यायिक निगरानी की भूमिका निभाई है। उनके अनुसार भारतीय मध्यस्थता व्यवस्था की व्यापक दिशा अधिक दक्षता, संस्थागत विकास और न्यूनतम न्यायिक हस्तक्षेप की ओर है।

जर्मनी के अनुभव का उल्लेख करते हुए सीजेआई ने जर्मन आर्बिट्रेशन इंस्टीट्यूट (DIS) की भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि DIS ने मामलों के प्रभावी प्रशासन और पक्षकारों की स्वायत्तता के सम्मान के क्षेत्र में मजबूत प्रतिष्ठा बनाई है। इंजीनियरिंग, विनिर्माण और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों से जुड़े जटिल विवादों से निपटने का उसका अनुभव भारत के लिए भी उपयोगी हो सकता है।

भारत और जर्मनी के बीच मध्यस्थता सहयोग को केवल सम्मेलनों तक सीमित रखने के बजाय स्थायी संस्थागत साझेदारी में बदलने के लिए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने चार प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान देने का सुझाव दिया।

पहला क्षेत्र संस्थागत सहयोग है। इसके तहत दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर, मुंबई सेंटर फॉर इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन, नानी पालखीवाला आर्बिट्रेशन सेंटर और DIS जैसी प्रमुख संस्थाओं के बीच संरचित साझेदारी विकसित की जा सकती है। संयुक्त कार्यक्रम, संस्थागत आदान-प्रदान और लगातार पेशेवर संवाद इसके महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं।

दूसरा क्षेत्र क्षमता निर्माण है। सीजेआई ने कहा कि ऐसे मध्यस्थ तैयार करने की आवश्यकता है जिनके पास केवल कानूनी ज्ञान ही नहीं, बल्कि कारोबारी परिस्थितियों और संबंधित उद्योगों की व्यावहारिक समझ भी हो।

तीसरा क्षेत्र न्यायिक संवाद है। उन्होंने कहा कि भारत और जर्मनी के न्यायिक तथा कानूनी समुदायों के बीच नियमित संवाद से अंतरिम राहत, मध्यस्थता पुरस्कारों के प्रवर्तन और न्यूयॉर्क कन्वेंशन के तहत सार्वजनिक नीति अपवाद जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अधिक स्पष्टता और पूर्वानुमेयता विकसित की जा सकती है।

चौथा क्षेत्र तकनीक और पारदर्शिता है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने वर्चुअल सुनवाई, डिजिटल केस मैनेजमेंट सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के व्यापक इस्तेमाल की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार तकनीक के इस्तेमाल से लागत और प्रक्रियात्मक देरी कम की जा सकती है, हालांकि निष्पक्ष सुनवाई और उचित प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों से समझौता नहीं होना चाहिए।

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अंततः मध्यस्थता की सफलता का आधार विश्वास है। मध्यस्थता तभी प्रभावी हो सकती है जब संस्थानों, मध्यस्थों, वकीलों और अदालतों सहित पूरा तंत्र कारोबार जगत का भरोसा हासिल करने में सक्षम हो।

जर्मन फेडरल बार और जर्मन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के सहयोग के लिए धन्यवाद देते हुए सीजेआई ने कहा कि बर्लिन में आयोजित यह सम्मेलन कोई अलग-थलग पहल नहीं होना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह प्रयास भारत और जर्मनी के बीच एक स्थायी “आर्बिट्रेशन ब्रिज” बनाने में मदद करेगा, जिससे दोनों देशों के बढ़ते कारोबारी संबंधों को मजबूती मिलेगी और सीमा-पार व्यावसायिक विवादों के समाधान को लेकर कंपनियों का भरोसा बढ़ेगा।