लिफ्ट से यात्रा करने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि लिफ्ट (एलीवेटर) को “कॉमन कैरियर” के समान माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि लिफ्ट का उपयोग करने वाले यात्रियों का उसके संचालन पर कोई नियंत्रण नहीं होता, इसलिए निर्माता, रखरखाव करने वाली एजेंसी और भवन के मालिक सभी पर यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का उच्च स्तर का दायित्व (Heightened Duty of Care) है।
न्यायमूर्ति पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने ओटिस एलीवेटर कंपनी की अपील खारिज करते हुए राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के आदेश को बरकरार रखा। आयोग ने वर्ष 2002 में नई दिल्ली स्थित रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) मुख्यालय में हुए एक घातक लिफ्ट हादसे में ओटिस एलीवेटर कंपनी, मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस (एमईएस) और रॉ को संयुक्त रूप से जिम्मेदार ठहराया था।
सुप्रीम कोर्ट ने एनसीडीआरसी द्वारा तय की गई जिम्मेदारी के अनुपात को भी सही माना। इसके तहत दुर्घटना के लिए 70 प्रतिशत जिम्मेदारी ओटिस एलीवेटर कंपनी, 25 प्रतिशत एमईएस और 5 प्रतिशत रॉ पर निर्धारित की गई।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आधुनिक शहरी जीवन में लिफ्ट एक आवश्यक सुविधा बन चुकी है और यात्री पूरी तरह उसकी तकनीकी सुरक्षा पर निर्भर रहते हैं। इसलिए लिफ्ट को केवल एक मशीन नहीं बल्कि ऐसे परिवहन साधन के रूप में देखा जाना चाहिए, जिस पर यात्रियों की सुरक्षा का विशेष दायित्व लागू होता है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि “कैरियर” की अवधारणा केवल लिफ्ट संचालक तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें निर्माता, रखरखाव एजेंसी और भवन का स्वामी भी शामिल हैं। इन सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है कि लिफ्ट पूरी तरह सुरक्षित स्थिति में संचालित हो।
यह मामला वर्ष 2002 में नई दिल्ली के लोधी रोड स्थित रॉ कार्यालय परिसर में हुई दुर्घटना से जुड़ा है। उस समय 13 वरिष्ठ अधिकारी लिफ्ट में सवार थे, जब लिफ्ट दो मंजिलों के बीच फंस गई। बचाव अभियान के दौरान एक वरिष्ठ अधिकारी आधे बाहर निकल चुके थे, तभी लिफ्ट अचानक नीचे खिसक गई और वे गंभीर रूप से कुचल गए, जिससे उनकी मृत्यु हो गई।
मृतक अधिकारी की पत्नी और बच्चों ने मुआवजे के लिए एनसीडीआरसी का दरवाजा खटखटाया था। आयोग ने परिवार को 3.01 करोड़ रुपये का मुआवजा ब्याज सहित देने का आदेश दिया और ओटिस, एमईएस तथा रॉ को संयुक्त रूप से जिम्मेदार ठहराया।
सुप्रीम कोर्ट में ओटिस ने दलील दी कि दुर्घटना इसलिए हुई क्योंकि बचाव अभियान के दौरान एमईएस के कर्मचारियों ने लिफ्ट का ब्रेक मैन्युअली खोल दिया था। कंपनी ने यह भी कहा कि उसने पहले ही अधिकारियों को बिजली के वोल्टेज में उतार-चढ़ाव की समस्या से अवगत कराया था और वोल्टेज स्टेबलाइजर लगाने की सलाह दी थी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि दुर्घटना के तत्काल कारण को अलग करके नहीं देखा जा सकता, क्योंकि लिफ्ट में बार-बार आने वाली तकनीकी खराबियों की जानकारी ओटिस को पहले से थी। निर्माता और व्यापक रखरखाव ठेकेदार होने के कारण ओटिस के पास विशेष तकनीकी विशेषज्ञता थी और वह लगातार बनी हुई विद्युत संबंधी समस्याओं से पूरी तरह परिचित थी।
पीठ ने कहा कि ओटिस ने स्वयं वोल्टेज की समस्या की पहचान की थी और स्टेबलाइजर लगाने की सिफारिश भी की थी, लेकिन उसने यह सुनिश्चित नहीं किया कि यह सुझाव लागू हो। इतना ही नहीं, उसने लिफ्ट को पूरी तरह सुरक्षित बनाए बिना उसके संचालन को भी नहीं रोका। अदालत ने इसे सेवा में स्पष्ट कमी (Deficiency in Service) माना।
अदालत ने यह भी कहा कि लिफ्ट के अंदर केवल चेतावनी संबंधी स्टिकर लगा देना पर्याप्त नहीं है। आपातकालीन बचाव कार्य करने वाले कर्मचारियों को उचित प्रशिक्षण देना भी आवश्यक है। न्यायालय ने माना कि रॉ की सीमित निगरानी संबंधी जिम्मेदारी थी और एमईएस से भी रखरखाव तथा बचाव अभियान में चूक हुई, लेकिन दुर्घटना की मुख्य जिम्मेदारी ओटिस एलीवेटर कंपनी की ही है।
सुप्रीम कोर्ट ने ओटिस की अपील खारिज करने के साथ ही मृतक अधिकारी की पत्नी की वह अपील भी स्वीकार कर ली, जिसमें एनसीडीआरसी द्वारा मुआवजा आदेश के क्रियान्वयन (एक्जीक्यूशन) की कार्यवाही रोकने को चुनौती दी गई थी। अदालत ने आयोग को कानून के अनुसार मुआवजा वसूली और आदेश के क्रियान्वयन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दिया।
