Supreme Court of India ने मणिपुर में पंचायत चुनाव कराने की समयसीमा 16 अक्टूबर 2026 तक बढ़ाने संबंधी High Court of Manipur के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि हाईकोर्ट पहले ही राज्य निर्वाचन आयोग को निर्धारित समयसीमा के भीतर चुनाव प्रक्रिया पूरी करने का बाध्यकारी निर्देश दे चुका है। ऐसे में इस स्तर पर हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
न्यायमूर्ति Justice N. Kotiswar Singh और न्यायमूर्ति Justice N. V. Anjaria की अवकाशकालीन पीठ ने फेइरोजाम हेरामनी एवं अन्य द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज कर दी। याचिका में 19 मई 2026 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत मणिपुर सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को छठे आम पंचायत चुनाव 16 अक्टूबर 2026 तक कराने की अनुमति दी गई थी।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल वर्ष 2022 में समाप्त हो चुका है, लेकिन लगभग चार वर्षों से पंचायतों में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व बहाल नहीं हो पाया है। उनका आरोप था कि राज्य सरकार ने अदालतों के समक्ष कई बार चुनाव कराने का आश्वासन दिया, फिर भी निर्धारित समयसीमा के भीतर चुनाव नहीं कराए गए।
याचिका में यह भी कहा गया कि निर्वाचित पंचायतों के स्थान पर बार-बार प्रशासनिक समितियों की नियुक्ति संविधान के Article 243E of the Constitution of India का उल्लंघन है। यह अनुच्छेद पंचायतों के लिए पांच वर्ष का निश्चित कार्यकाल सुनिश्चित करता है तथा समय पर चुनाव कराने का संवैधानिक दायित्व निर्धारित करता है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार लोकतांत्रिक संस्थाओं का स्थान अनिश्चितकाल तक प्रशासनिक समितियां नहीं ले सकतीं।
याचिकाकर्ताओं ने मणिपुर पंचायत राज अधिनियम, 1994 की धारा 109 के तहत जिला परिषदों के लिए प्रशासनिक समितियां गठित करने की वैधता पर भी सवाल उठाया। उनका तर्क था कि अधिनियम की धारा 92 केवल विशेष परिस्थितियों में प्रशासक नियुक्त करने का प्रावधान करती है, प्रशासनिक समितियों के गठन का नहीं।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उपस्थित Tushar Mehta ने अतिरिक्त आश्वासन देने की मांग का विरोध करते हुए कहा कि हाईकोर्ट का आदेश पहले से ही राज्य सरकार पर बाध्यकारी है। यदि किसी अप्रत्याशित कानून-व्यवस्था की स्थिति के कारण चुनाव कार्यक्रम प्रभावित होता है तो अतिरिक्त शपथपत्र सरकार को अनावश्यक अवमानना कार्यवाही के जोखिम में डाल सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की दलील स्वीकार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं की मुख्य चिंता का समाधान हाईकोर्ट पहले ही कर चुका है। जब चुनाव कराने के लिए न्यायिक आदेश प्रभावी है, तब सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं बनता। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं करती या कानून के विपरीत कार्य करती है, तो याचिकाकर्ता सक्षम न्यायालय के समक्ष उपलब्ध कानूनी उपाय अपना सकते हैं। इसके साथ ही विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी गई।
गौरतलब है कि मणिपुर हाईकोर्ट ने अगस्त 2025 के अपने पूर्व आदेश की समीक्षा करते हुए चुनाव कराने की समयसीमा बढ़ाई थी। राज्य सरकार ने दलील दी थी कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था की चुनौती और फरवरी 2025 में राष्ट्रपति शासन लागू होने के कारण निर्धारित अवधि में पंचायत चुनाव कराना संभव नहीं था। इन असाधारण परिस्थितियों को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश Chief Justice M. Sundar और न्यायमूर्ति Justice A. Guneshwar Sharma की खंडपीठ ने चुनाव प्रक्रिया पूरी करने के लिए 16 अक्टूबर 2026 तक का समय प्रदान किया।
