RERA की समयसीमा बढ़ने से नहीं बदलेंगे खरीदारों के अधिकार, कब्जा नहीं देने पर बिल्डर को ब्याज और रिफंड देने का आदेश

Maharashtra Real Estate Regulatory Authority - MAHA RERA

मुंबई स्थित महाराष्ट्र रियल एस्टेट विनियामक प्राधिकरण (महारेरा) ने घर खरीदारों के अधिकारों को मजबूत करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। प्राधिकरण ने स्पष्ट किया है कि किसी परियोजना की महारेरा वेबसाइट पर दर्ज संशोधित पूर्णता अवधि (Completion Date) बिल्डर और खरीदार के बीच हुए पंजीकृत विक्रय समझौते (Agreement for Sale) में तय कब्जा देने की तारीख का स्थान नहीं ले सकती। यदि बिल्डर तय समय पर कब्जा देने में विफल रहता है तो खरीदार को रेरा कानून के तहत ब्याज या धनवापसी मांगने का पूरा अधिकार रहेगा। यह आदेश टायकून्स स्क्वायर एवेन्यू आई टॉवर-सी परियोजना से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में 15 जून 2026 को पारित किया गया।

मामले में एक शिकायत वाणिज्यिक कार्यालय के खरीदार की थी, जबकि दूसरी शिकायत आवासीय फ्लैट खरीदने वाले दो आवंटियों की थी। पहले मामले में शिकायतकर्ता ने 39 लाख रुपये में कार्यालय खरीदा था और बिल्डर ने 1 मार्च 2024 तक कब्जा देने का आश्वासन दिया था, लेकिन समयसीमा बीत जाने के बाद भी न तो ऑक्युपेशन सर्टिफिकेट मिला और न ही कब्जा सौंपा गया। दूसरे मामले में खरीदारों ने एक करोड़ सात लाख रुपये से अधिक कीमत का फ्लैट बुक किया था और लगभग 68.82 लाख रुपये का भुगतान कर दिया था। समझौते के अनुसार 30 मार्च 2023 तक कब्जा मिलना था, लेकिन परियोजना पूरी नहीं होने के कारण खरीदारों ने रियल एस्टेट (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 2016 की धारा 18(1)(क) के तहत परियोजना से बाहर निकलकर धनवापसी की मांग की।

बिल्डर ने अपने बचाव में कहा कि परियोजना एमएचएडीए की भूमि पर होने के कारण कई सरकारी स्वीकृतियों में देरी हुई। इसके अलावा वित्तीय कठिनाइयों, एचडीएफसी बैंक से जुड़ी फंडिंग समस्याओं और अन्य तकनीकी कारणों के चलते परियोजना समय पर पूरी नहीं हो सकी। बिल्डर ने यह भी दलील दी कि महारेरा पोर्टल पर परियोजना की संशोधित पूर्णता तिथि 30 जून 2027 दर्ज है, इसलिए उसी के आधार पर देरी का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

महारेरा ने बिल्डर की इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। प्राधिकरण ने कहा कि यदि परियोजना में वास्तविक बाधाएं थीं तो बिल्डर का दायित्व था कि वह समय रहते खरीदारों को इसकी जानकारी देता और समझौते में कब्जा देने की तारीख संशोधित कराता। रिकॉर्ड से ऐसा कोई प्रयास दिखाई नहीं देता। इसलिए अब बिल्डर देरी के लिए इन कारणों का लाभ नहीं उठा सकता।

प्राधिकरण ने बॉम्बे हाईकोर्ट के नीलकमल रियल्टर्स बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए कहा कि “रेरा पंजीकरण में बढ़ाई गई समयसीमा, समझौते में तय कब्जा देने की शर्त को समाप्त नहीं करती और विलंबित कब्जे पर ब्याज पाने का अधिकार पूर्ण तथा बिना शर्त है।” इसी आधार पर महारेरा ने माना कि पोर्टल पर दर्ज परियोजना की पूर्णता तिथि और खरीदार के साथ हुए समझौते में तय कब्जा तिथि अलग-अलग हैं तथा खरीदार के अधिकार समझौते के अनुसार ही निर्धारित होंगे।

प्राधिकरण ने पहले मामले में बिल्डर को कार्यालय का कब्जा ऑक्युपेशन सर्टिफिकेट के साथ सौंपने तथा 2 मार्च 2024 से वास्तविक कब्जा मिलने तक भारतीय स्टेट बैंक की उच्चतम एमसीएलआर दर में 2 प्रतिशत जोड़कर निर्धारित ब्याज का भुगतान करने का आदेश दिया।

दूसरे मामले में महारेरा ने खरीदारों को परियोजना से हटने की अनुमति देते हुए बिल्डर को 58.51 लाख रुपये की बिक्री मूल्य राशि पर 31 मार्च 2023 से भुगतान की तारीख तक वैधानिक ब्याज सहित धनवापसी करने का निर्देश दिया। प्राधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 18 के तहत केवल बिल्डर को दिए गए बिक्री मूल्य की वापसी होगी, जबकि स्टांप शुल्क, पंजीयन शुल्क और सरकारी कर इसमें शामिल नहीं होंगे। धनवापसी के बाद विक्रय समझौता निरस्त करने की जिम्मेदारी और उससे संबंधित खर्च भी बिल्डर को ही वहन करना होगा। दोनों मामलों में शिकायतकर्ताओं को 20-20 हजार रुपये वाद व्यय भी प्रदान किया गया।

यह निर्णय रियल एस्टेट (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 2016 की धारा 18 के दायरे को और स्पष्ट करता है। आदेश का व्यावहारिक प्रभाव यह है कि यदि बिल्डर निर्धारित तिथि तक कब्जा देने में असफल रहता है तो वह केवल रेरा पोर्टल पर दर्ज संशोधित परियोजना अवधि का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। ऐसे मामलों में खरीदार अपनी परिस्थिति के अनुसार विलंबित कब्जे पर ब्याज या परियोजना से हटकर धनवापसी, दोनों में से किसी भी वैधानिक राहत का दावा कर सकते हैं।