राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए कोटक महिंद्रा बैंक को निर्देश दिया है कि वह अरुण ऑरोविला परियोजना से संबंधित मूल टाइटल डीड्स, सुरक्षा दस्तावेज और चार्ज रिलीज दस्तावेज 15 दिनों के भीतर सफल समाधान आवेदक को सौंपे। न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि जब स्वीकृत समाधान योजना के तहत बैंक को पूरा भुगतान मिल चुका है, तब दस्तावेज अपने पास बनाए रखने का कोई कानूनी आधार नहीं बचता।
मामला अरुण शेल्टर्स के कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) से जुड़ा है, जिसे आईबीसी की धारा 7 के तहत कोटक महिंद्रा बैंक की याचिका पर वर्ष 2020 में शुरू किया गया था। बाद में समाधान आवेदक की योजना को लेनदारों की समिति (सीओसी) और फिर एनसीएलटी द्वारा नवंबर 2022 में मंजूरी दी गई थी। योजना को स्वीकृति देते समय न्यायाधिकरण ने यह भी कहा था कि अरुण ऑरोविला परियोजना की भूमि और भवन पर बैंक का चार्ज केवल तब तक रहेगा, जब तक समाधान योजना के अनुसार पूरा भुगतान नहीं हो जाता।
समाधान आवेदक ने न्यायाधिकरण को बताया कि उसने योजना के तहत सभी लेनदारों को कुल 53.42 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया है। इसके अतिरिक्त ब्याज को लेकर विवाद होने के बावजूद उसने लगभग 4.55 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि भी “विरोध दर्ज कराते हुए” जमा कर दी, ताकि समाधान योजना के क्रियान्वयन में कोई बाधा न आए। इसके बाद उसने बैंक से मूल दस्तावेज और सुरक्षा अभिलेख वापस मांगे, लेकिन बैंक ने लंबित कानूनी कार्यवाहियों का हवाला देकर दस्तावेज जारी करने से इनकार कर दिया।
बैंक का तर्क था कि ब्याज माफी से जुड़ा विवाद अभी राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) में लंबित है और जब तक सभी विवाद समाप्त नहीं हो जाते, तब तक दस्तावेज जारी नहीं किए जा सकते। वहीं समाधान आवेदक का कहना था कि बैंक को पूरा भुगतान प्राप्त हो चुका है, इसलिए दस्तावेज रोककर रखना स्वीकृत समाधान योजना की भावना के विपरीत है।
एनसीएलटी ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि ब्याज विवाद से संबंधित अपील लंबित होने के बावजूद बैंक को मूल राशि और विवादित ब्याज सहित पूरा भुगतान मिल चुका है। न्यायाधिकरण ने कहा कि केवल इस आधार पर कि ब्याज का मुद्दा अभी अपील में विचाराधीन है, बैंक को परियोजना के महत्वपूर्ण दस्तावेज अपने कब्जे में रखने का अधिकार नहीं मिल जाता।
अपने आदेश में न्यायाधिकरण ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “स्वीकृत समाधान योजना के तहत पूर्ण भुगतान प्राप्त करने के बाद बैंक के पास टाइटल डीड्स और अन्य सुरक्षा दस्तावेज अपने पास रखने का कोई आधार नहीं है।” न्यायाधिकरण ने यह भी कहा कि “ब्याज भुगतान का मुद्दा अपील में लंबित होना, दस्तावेजों की अभिरक्षा बनाए रखने का वैध कारण नहीं बन सकता।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अपील का अंतिम परिणाम चाहे जो हो, बैंक को अंततः दस्तावेज लौटाने ही होंगे। इसलिए अभी दस्तावेज जारी करने से बैंक को किसी प्रकार की हानि नहीं होगी, जबकि समाधान आवेदक को परियोजना के प्रभावी संचालन और समाधान योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए इन दस्तावेजों की आवश्यकता है।
बेंगलुरु स्थित राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए कोटक महिंद्रा बैंक को निर्देश दिया है कि वह अरुण ऑरोविला परियोजना से संबंधित मूल टाइटल डीड्स, सुरक्षा दस्तावेज और चार्ज रिलीज दस्तावेज 15 दिनों के भीतर सफल समाधान आवेदक को सौंपे। न्यायाधिकरण ने स्पष्ट किया कि जब स्वीकृत समाधान योजना के तहत बैंक को पूरा भुगतान मिल चुका है, तब दस्तावेज अपने पास बनाए रखने का कोई कानूनी आधार नहीं बचता।
मामला अरुण शेल्टर्स के कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) से जुड़ा है, जिसे आईबीसी की धारा 7 के तहत कोटक महिंद्रा बैंक की याचिका पर वर्ष 2020 में शुरू किया गया था। बाद में समाधान आवेदक की योजना को लेनदारों की समिति (सीओसी) और फिर एनसीएलटी द्वारा नवंबर 2022 में मंजूरी दी गई थी। योजना को स्वीकृति देते समय न्यायाधिकरण ने यह भी कहा था कि अरुण ऑरोविला परियोजना की भूमि और भवन पर बैंक का चार्ज केवल तब तक रहेगा, जब तक समाधान योजना के अनुसार पूरा भुगतान नहीं हो जाता।
समाधान आवेदक ने न्यायाधिकरण को बताया कि उसने योजना के तहत सभी लेनदारों को कुल 53.42 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया है। इसके अतिरिक्त ब्याज को लेकर विवाद होने के बावजूद उसने लगभग 4.55 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि भी “विरोध दर्ज कराते हुए” जमा कर दी, ताकि समाधान योजना के क्रियान्वयन में कोई बाधा न आए। इसके बाद उसने बैंक से मूल दस्तावेज और सुरक्षा अभिलेख वापस मांगे, लेकिन बैंक ने लंबित कानूनी कार्यवाहियों का हवाला देकर दस्तावेज जारी करने से इनकार कर दिया।
बैंक का तर्क था कि ब्याज माफी से जुड़ा विवाद अभी राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) में लंबित है और जब तक सभी विवाद समाप्त नहीं हो जाते, तब तक दस्तावेज जारी नहीं किए जा सकते। वहीं समाधान आवेदक का कहना था कि बैंक को पूरा भुगतान प्राप्त हो चुका है, इसलिए दस्तावेज रोककर रखना स्वीकृत समाधान योजना की भावना के विपरीत है।
एनसीएलटी ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि ब्याज विवाद से संबंधित अपील लंबित होने के बावजूद बैंक को मूल राशि और विवादित ब्याज सहित पूरा भुगतान मिल चुका है। न्यायाधिकरण ने कहा कि केवल इस आधार पर कि ब्याज का मुद्दा अभी अपील में विचाराधीन है, बैंक को परियोजना के महत्वपूर्ण दस्तावेज अपने कब्जे में रखने का अधिकार नहीं मिल जाता।
अपने आदेश में न्यायाधिकरण ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, “स्वीकृत समाधान योजना के तहत पूर्ण भुगतान प्राप्त करने के बाद बैंक के पास टाइटल डीड्स और अन्य सुरक्षा दस्तावेज अपने पास रखने का कोई आधार नहीं है।” न्यायाधिकरण ने यह भी कहा कि “ब्याज भुगतान का मुद्दा अपील में लंबित होना, दस्तावेजों की अभिरक्षा बनाए रखने का वैध कारण नहीं बन सकता।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अपील का अंतिम परिणाम चाहे जो हो, बैंक को अंततः दस्तावेज लौटाने ही होंगे। इसलिए अभी दस्तावेज जारी करने से बैंक को किसी प्रकार की हानि नहीं होगी, जबकि समाधान आवेदक को परियोजना के प्रभावी संचालन और समाधान योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए इन दस्तावेजों की आवश्यकता है।
इस आदेश को आईबीसी के तहत समाधान योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। निर्णय यह संदेश देता है कि एक बार समाधान आवेदक अपनी सभी वित्तीय जिम्मेदारियां पूरी कर देता है, तो वित्तीय लेनदार लंबित सहायक विवादों का बहाना बनाकर परियोजना या संपत्ति से जुड़े मूल दस्तावेज अपने पास नहीं रख सकते।
