बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने चेक बाउंस से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि कंपनी की ओर से शिकायत चलाने वाले प्रतिनिधि के अधिकार संबंधी पावर ऑफ अटॉर्नी या बोर्ड प्रस्ताव शुरुआत में रिकॉर्ड पर पेश नहीं किया जाना एक सुधार योग्य प्रक्रियात्मक कमी है। केवल इस तकनीकी आधार पर कंपनी की शिकायत खारिज नहीं की जा सकती, बल्कि कंपनी को संबंधित दस्तावेज पेश करने का अवसर दिया जाना चाहिए।
जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल ने यह आदेश 10 सितंबर 2026 को भिलाई इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड की ओर से दायर एक्विटल अपील में पारित किया। अपील में दुर्ग के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी द्वारा 16 जुलाई 2012 को पारित उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें एस.आर. ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड और उसके प्रबंध निदेशक भास्कर घोष के खिलाफ नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत दायर शिकायत को खारिज करते हुए आरोपियों को बरी कर दिया गया था।
मामला दोनों कंपनियों के बीच हुए व्यावसायिक लेनदेन से जुड़ा था। भिलाई इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन ने वर्ष 1999 में जारी एक खरीद आदेश के तहत एस.आर. ग्लोबल को तकनीकी संरचनाएं और इंजीनियरिंग सामग्री उपलब्ध कराई थी। शिकायतकर्ता कंपनी के अनुसार, बकाया भुगतान के लिए एस.आर. ग्लोबल ने 30 अप्रैल 2000 को 15,52,850 रुपये का चेक जारी किया था। चेक बैंक में प्रस्तुत किए जाने पर पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण dishonour हो गया। इसके बाद कानूनी मांग नोटिस भेजा गया, लेकिन भुगतान नहीं हुआ और कंपनी ने 13 नवंबर 2000 को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज कराई।
ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2012 में शिकायत खारिज करते हुए पाया था कि कंपनी की ओर से मामले को आगे बढ़ाने वाले आर.के. शुक्ला के पास कंपनी की ओर से शिकायत दर्ज करने और साक्ष्य देने का पर्याप्त अधिकार साबित करने के लिए पावर ऑफ अटॉर्नी या बोर्ड प्रस्ताव रिकॉर्ड पर नहीं था। इसी आधार पर आरोपियों को बरी कर दिया गया था।
हाईकोर्ट में अपीलकर्ता कंपनी की ओर से तर्क दिया गया कि शिकायत में स्वयं आर.के. शुक्ला को कंपनी का डिविजनल मैनेजर और पावर ऑफ अटॉर्नी होल्डर बताया गया था। यदि ट्रायल कोर्ट को उनके अधिकार को लेकर संदेह था, तो कंपनी को संबंधित दस्तावेज पेश करने का अवसर दिया जाना चाहिए था। कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट के Haryana State Cooperative Supply and Marketing Federation Limited v. Jayam Textile and Others फैसले का भी हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने M.M.T.C. Limited v. MEDCHL Chemicals and Pharma (P) Limited, Jayam Textile और A.C. Narayanan v. State of Maharashtra जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भरोसा किया। कोर्ट ने माना कि कंपनी एक कानूनी इकाई होने के कारण न्यायालय में किसी प्राकृतिक व्यक्ति के माध्यम से कार्य करती है। हालांकि, उस प्रतिनिधि के अधिकार से संबंधित दस्तावेज बाद में भी प्रस्तुत किए जा सकते हैं और ऐसी कमी को आवश्यक प्रक्रिया के माध्यम से दूर किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने यह निष्कर्ष नहीं दिया था कि शिकायतकर्ता कंपनी चेक की payee या holder in due course नहीं थी। न ही यह पाया गया था कि चेक किसी वैध देनदारी के लिए जारी नहीं हुआ था। शिकायत को केवल इस वजह से खारिज किया गया कि आर.के. शुक्ला के अधिकार का दस्तावेज रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं किया गया था।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया, “यदि ट्रायल कोर्ट को उनके अधिकार को लेकर संदेह था, तो उचित तरीका यह था कि शिकायतकर्ता कंपनी को पावर ऑफ अटॉर्नी, बोर्ड प्रस्ताव या अन्य प्राधिकरण संबंधी दस्तावेज पेश करने का अवसर दिया जाता।” कोर्ट ने माना कि प्रतिनिधि के अधिकार से जुड़ी कमी सुधार योग्य थी और इसे शिकायत खारिज करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता था।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अपील में बरी किए गए आरोपी के पक्ष में निर्दोषता की धारणा को ध्यान में रखना जरूरी है। हालांकि, यदि बरी करने का फैसला कानून की गलत व्याख्या पर आधारित हो और मामले का फैसला वास्तविक विवाद के गुण-दोष पर नहीं किया गया हो, तो अपीलीय अदालत हस्तक्षेप कर सकती है और मामले को दोबारा सुनवाई के लिए भेज सकती है।
इसी आधार पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 16 जुलाई 2012 का ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस भेज दिया। कंपनी को आर.के. शुक्ला के अधिकार को साबित करने वाले आवश्यक दस्तावेज रिकॉर्ड पर पेश करने तथा जरूरत होने पर साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई है। ट्रायल कोर्ट को दोनों पक्षों को सुनने के बाद शिकायत का गुण-दोष के आधार पर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है।
पक्षकारों को 29 सितंबर 2026 को ट्रायल कोर्ट के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया गया है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से शिकायत का शीघ्र निपटारा करने के लिए हर संभव प्रयास करने को भी कहा है।
यह फैसला कंपनियों द्वारा धारा 138, नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत दायर चेक बाउंस मामलों के लिए महत्वपूर्ण है। आदेश का मूल सिद्धांत यह है कि किसी कंपनी के अधिकृत प्रतिनिधि से जुड़ी ऐसी प्रक्रियात्मक कमी, जिसे बाद में सुधारा जा सकता है, उसे शिकायत के वास्तविक विवाद की सुनवाई से रोकने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
